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<title>انديشه ديني</title>
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<description>سياستنامه اي در باب انديشه سياسي اسلام</description>
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<lastBuildDate>Mon, 09 Nov 2009 11:37:48 GMT</lastBuildDate>
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<title>گزارش مركز آموزش مديريت دولتي و موسسه عالي پژوهش در برنامه ريزي و توسعه از همکاری محققان با دولت </title>
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&lt;TR&gt;
&lt;TD width=48&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;I&gt;رديف&lt;/I&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;&lt;/TD&gt;
&lt;TD width=316&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;I&gt;                  نام پروژه&lt;/I&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;&lt;/TD&gt;
&lt;TD width=168&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;I&gt;نام مدير&lt;/I&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;&lt;/TD&gt;
&lt;TD width=94&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;I&gt;تاريخ شروع&lt;/I&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;&lt;/TD&gt;&lt;/TR&gt;
&lt;TR&gt;
&lt;TD width=48&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;85&lt;/P&gt;&lt;/TD&gt;
&lt;TD vAlign=top width=316&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;بررسي تحولات جمعيتي در طي سه دهه گذشته و پيش‌بيني تأثير ساختار سني حاصل از اين تغييرات در نياز‌هاي اجتماعي و بهره‌وري نيروي انساني در پنج‌دهه اول قرن 21&lt;/P&gt;&lt;/TD&gt;
&lt;TD width=168&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;دكتر امير هوشنگ مهريار&lt;/P&gt;&lt;/TD&gt;
&lt;TD width=94&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;1382&lt;/P&gt;&lt;/TD&gt;&lt;/TR&gt;
&lt;TR&gt;
&lt;TD width=48&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;86&lt;/P&gt;&lt;/TD&gt;
&lt;TD vAlign=top width=316&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;نقش قوانين و مقررات در بازار كار ايران&lt;/P&gt;&lt;/TD&gt;
&lt;TD width=168&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;سيد علي هاشمي&lt;/P&gt;&lt;/TD&gt;
&lt;TD width=94&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;1382&lt;/P&gt;&lt;/TD&gt;&lt;/TR&gt;
&lt;TR&gt;
&lt;TD width=48&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;87&lt;/P&gt;&lt;/TD&gt;
&lt;TD vAlign=top width=316&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;شناسايي ظرفيت‌هاي اشتغال‌زايي در زير بخش‌هاي خدمات&lt;/P&gt;&lt;/TD&gt;
&lt;TD width=168&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;دكتر صالح قويدل&lt;/P&gt;&lt;/TD&gt;
&lt;TD width=94&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;1382&lt;/P&gt;&lt;/TD&gt;&lt;/TR&gt;
&lt;TR&gt;
&lt;TD width=48&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;88&lt;/P&gt;&lt;/TD&gt;
&lt;TD width=316&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;بررسي ساختار بازار كار در كشور با توجه به موانع اشتغال و پيشنهاد راهكارهاي اجرايي&lt;/P&gt;&lt;/TD&gt;
&lt;TD width=168&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;نعمت فليحي&lt;/P&gt;&lt;/TD&gt;
&lt;TD width=94&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;1382&lt;/P&gt;&lt;/TD&gt;&lt;/TR&gt;
&lt;TR&gt;
&lt;TD width=48&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;89&lt;/P&gt;&lt;/TD&gt;
&lt;TD width=316&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;مقالات مباني ‌نظري‌ و انديشه‌هاي حضرت‌‌‌ امام ‌خميني (ره)&lt;/P&gt;&lt;/TD&gt;
&lt;TD width=168&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;عليرضا فدايي عراقي&lt;/P&gt;&lt;/TD&gt;
&lt;TD width=94&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;1383&lt;/P&gt;&lt;/TD&gt;&lt;/TR&gt;
&lt;TR&gt;
&lt;TD width=48&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;90&lt;/P&gt;&lt;/TD&gt;
&lt;TD width=316&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;رويكردهاي فكري فرهنگي ايران بعد از انقلاب اسلامي&lt;/P&gt;&lt;/TD&gt;
&lt;TD width=168&gt;
&lt;P dir=ltr&gt;دكتر مقصود فراستخواه&lt;/P&gt;&lt;/TD&gt;
&lt;TD width=94&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;1383&lt;/P&gt;&lt;/TD&gt;&lt;/TR&gt;
&lt;TR&gt;
&lt;TD width=48&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;91&lt;/P&gt;&lt;/TD&gt;
&lt;TD width=316&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;تدوين شناسنامه احكام قانون بودجه&lt;/P&gt;&lt;/TD&gt;
&lt;TD width=168&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;دكتر جعفر عبادي&lt;/P&gt;&lt;/TD&gt;
&lt;TD width=94&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;1384&lt;/P&gt;&lt;/TD&gt;&lt;/TR&gt;
&lt;TR&gt;
&lt;TD width=48&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;92&lt;/P&gt;&lt;/TD&gt;
&lt;TD vAlign=top width=316&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;تدوين برنامه راهبردي(استراتژيك) مؤسسه عالي آموزش و پژوهش مديريت و برنامه‌ريزي&lt;/P&gt;&lt;/TD&gt;
&lt;TD width=168&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;دكترعباس منوريان&lt;/P&gt;&lt;/TD&gt;
&lt;TD width=94&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;1384&lt;/P&gt;&lt;/TD&gt;&lt;/TR&gt;
&lt;TR&gt;
&lt;TD width=48&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;93&lt;/P&gt;&lt;/TD&gt;
&lt;TD vAlign=top width=316&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;اقتصاد دانايي محور، تعاريف و مفاهيم، اندازه‌گيري، الزامات و تمهيدات براي ايران&lt;/P&gt;&lt;/TD&gt;
&lt;TD width=168&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;دكتر حسين عباسي نژاد&lt;/P&gt;&lt;/TD&gt;
&lt;TD width=94&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;1384&lt;/P&gt;&lt;/TD&gt;&lt;/TR&gt;
&lt;TR&gt;
&lt;TD width=48&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;94&lt;/P&gt;&lt;/TD&gt;
&lt;TD vAlign=top width=316&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;نيازسنجي آموزشي مديران عالي در بخش دولتي‌ايران&lt;/P&gt;&lt;/TD&gt;
&lt;TD width=168&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;دكتر فرج‌اله رهنورد&lt;/P&gt;&lt;/TD&gt;
&lt;TD width=94&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;1385&lt;/P&gt;&lt;/TD&gt;&lt;/TR&gt;
&lt;TR&gt;
&lt;TD width=48&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;95&lt;/P&gt;&lt;/TD&gt;
&lt;TD vAlign=top width=316&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;بررسي و ارزيابي رفتار انتقال قيمت در بازار مواد غذايي ايران، بازار گوشت مرغ، گوشت گاو، شير و تخم‌مرغ&lt;/P&gt;&lt;/TD&gt;
&lt;TD width=168&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;دكتر سيدصفدر حسيني&lt;/P&gt;&lt;/TD&gt;
&lt;TD width=94&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;1385&lt;/P&gt;&lt;/TD&gt;&lt;/TR&gt;
&lt;TR&gt;
&lt;TD width=48&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;96&lt;/P&gt;&lt;/TD&gt;
&lt;TD vAlign=top width=316&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;محورها و مضامين برنامه پنجم توسعه كشور مبتني بر الزامات سند چشم‌انداز و الگوي توسعه اسلامي– ايراني: اصلاح نظام بانكداري اسلامي، قانون عمليات بانكي بدون ربا، بررسي راهبرد مناسب توسعه اقتصادي عادلانه براي ايران اسلامي&lt;/P&gt;&lt;/TD&gt;
&lt;TD width=168&gt;
&lt;P dir=ltr&gt;محمود حكمت‌نيا&lt;/P&gt;&lt;/TD&gt;
&lt;TD width=94&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;9/1/86&lt;/P&gt;&lt;/TD&gt;&lt;/TR&gt;
&lt;TR&gt;
&lt;TD width=48&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;97&lt;/P&gt;&lt;/TD&gt;
&lt;TD vAlign=top width=316&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;محورها و مضامين برنامه پنجم توسعه كشور مبتني بر الزامات سند چشم‌انداز و الگوي توسعه اسلامي- ايراني: محور اول (تبيين الگوي توسعه اسلامي ايراني )  &lt;/P&gt;&lt;/TD&gt;
&lt;TD width=168&gt;
&lt;P dir=ltr&gt;سيد محمد محسن دعايي&lt;/P&gt;&lt;/TD&gt;
&lt;TD width=94&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;9/1/86&lt;/P&gt;&lt;/TD&gt;&lt;/TR&gt;
&lt;TR&gt;
&lt;TD width=48&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;98&lt;/P&gt;&lt;/TD&gt;
&lt;TD vAlign=top width=316&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;محورها و مضامين برنامه پنجم سازندگي كشور مبتني بر الزامات سند چشم‌انداز و الگوي توسعه اسلامي – ايراني:- محور چهارم (تبيين رويكرد الگوي توسعه اسلامي ايراني در امور سياسي و امنيتي)&lt;/P&gt;&lt;/TD&gt;
&lt;TD width=168&gt;
&lt;P dir=ltr&gt;دكتر محسن مهاجرنيا&lt;/P&gt;&lt;/TD&gt;
&lt;TD width=94&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;9/1/86&lt;/P&gt;&lt;/TD&gt;&lt;/TR&gt;
&lt;TR&gt;
&lt;TD width=48&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;99&lt;/P&gt;&lt;/TD&gt;
&lt;TD vAlign=top width=316&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;محورها و مضامين برنامه پنجم سازندگي كشور مبتني بر الزامات سند چشم‌انداز و الگوي توسعه اسلامي – ايراني محور سوم (تبيين رويكرد الگوي توسعه اسلامي ايراني در امور اجتماعي): شناخت سرمايه اجتماعي از ديدگاه اسلام و نقش آن در توسعه اقتصادي و ارائه راهبردهايي براي برنامه پنجم توسعه&lt;/P&gt;&lt;/TD&gt;
&lt;TD width=168&gt;
&lt;P dir=ltr&gt;دكتر سيدحسين ميرمعزي&lt;/P&gt;&lt;/TD&gt;
&lt;TD width=94&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;9/1/86&lt;/P&gt;&lt;/TD&gt;&lt;/TR&gt;
&lt;TR&gt;
&lt;TD width=48&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;100&lt;/P&gt;&lt;/TD&gt;
&lt;TD vAlign=top width=316&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;مطالعات محورها و مضامين برنامه پنجم سازندگي كشور با رويكرد توسعه اسلامي- ايراني محور دوم (تبيين رويكرد الگوي توسعه اسلامي ايراني در امور امور فرهنگي)&lt;/P&gt;&lt;/TD&gt;
&lt;TD width=168&gt;
&lt;P dir=ltr&gt;جواد ابوالقاسمي&lt;/P&gt;&lt;/TD&gt;
&lt;TD width=94&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;9/1/86&lt;/P&gt;&lt;/TD&gt;&lt;/TR&gt;&lt;/TBODY&gt;&lt;/TABLE&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;/P&gt;&lt;/TD&gt;&lt;/TR&gt;&lt;/TBODY&gt;&lt;/TABLE&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;/P&gt;&lt;/TD&gt;&lt;/TR&gt;&lt;/TBODY&gt;&lt;/TABLE&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;/P&gt;&lt;/TD&gt;&lt;/TR&gt;&lt;/TBODY&gt;&lt;/TABLE&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;/P&gt;&lt;/TD&gt;&lt;/TR&gt;&lt;/TBODY&gt;&lt;/TABLE&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;P dir=rtl&gt; &lt;/P&gt;</description>
<pubDate>Mon, 09 Nov 2009 11:37:48 GMT</pubDate>
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<title>از پگاه حوزه</title>
<link>http://mohsen43.blogfa.com/post-99.aspx</link>
<description>&lt;P dir=rtl&gt;پگاه حوزه (ویژه حوزه های دینی) :: 20 فروردین 1387 - شماره 52  &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;     گزارش/طلبگى سیاسى، سیاست طلبگى &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;اشاره&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;«ورود به مقولات سیاسى در حوزه»، «بحث تربیت سیاسى طلاب جوان و آشنا نمودن آنها با مسائل و اندیشه هاى مطرح در دنیاى سیاست» و «ضرورت یا عدم ضرورت دخالت روحانیت در مسائل سیاسى جامعه» از جمله مسائلى است که نه تنها امروز، بلکه در گذشته نیز اذهان حوزویان به ویژه نخبگان و متولیان امور روحانیت را به خود مشغول داشته است و البته در این میان آرا و نظرات حضرت امام (ره) و مقام معظم رهبرى بر پایه لزوم تحول و پویایى در حوزه هاى علمیه، بر این مبتنى شده که حوزه به طور جدى ارتقاى دانش و بصیرت سیاسى خویش را در دستور کار قرار دهد.&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;در همین خصوص به ویژه مسئله تربیت سیاسى طلاب جوان، در گفتگو با تنى چند از طلاب جوان حوزه این مباحث را مطرح کردیم و به بیان عصاره اى از نظرات آنها پرداخته ایم. البته در لابه لاى گفته هاى طلبه هاى جوان، از صحبت هاى کارشناسى حجت الاسلام و المسلمین دکتر نجف لک زایى مدیر پژوهشکده اندیشه سیاسى و نیز حجت الاسلام دکتر مهاجرنیا، پژوهشگر پژوهشگاه فرهنگ و اندیشه سیاسى و رئیس انجمن مطالعات سیاسى حوزه علمیه قم بهره گرفته ایم. &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;تربیت سیاسى باید هوشمندانه باشد &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;على رفیعى، طلبه پایه پنجم با بیان این که ورود هر طلبه اى به ویژه طلاب جوان ما که به حق امید اصلى حوزه در آینده نه چندان دور هستند، باید هوشمندانه و مدبرانه صورت گیرد، گفت: شک نباید کرد که حوزه باید به طور جدى به مسئله تربیت سیاسى طلاب جوان، بها بدهد کما اینکه در گذشته کم و بیش این توجه وجود داشته است. اما در شرایط فعلى ما، که روحانیت به نوعى تصمیم گیر مسائل اجرایى و سیاسى کشور &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;شده و حکومت در دست آنهاست به مراتب ضرورت این بحث بیش از پیش خود را نشان مى دهد.&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;صرف همایش گذاشتن، چاره کار نیست!&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;وى افزود: منظور بنده از این که عرض کردم حوزه باید در شرایط کنونى وارد این قبیل مسائل شود، صرفا این نیست که بیاییم فى المثل چهار نشست و همایش سیاسى در مدارس برگزار کنیم یا اینکه چهار جزوه آموزشى و تحلیلى در خصوص بحث هاى روز سیاسى بین طلبه ها توزیع کنیم؛ البته اینها هم لازم است، اما باید رویکرد کلان حوزه و مدیران و مسؤولان این باشد که بصیرت و بینش سیاسى طلاب على الخصوص طلاب جوان از طریق روش هاى جدید و کار آمد ارتقا پیدا کند که همایش گذاشتن هم ممکن است یک روش براى تحقق آن هدف اصلى باشد.&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;ضرورت مشارکت فعال طلاب جوان در طرح تربیت سیاسى ؛&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;در همین زمینه، حجت الاسلام و المسلمین دکتر لک زایى با تأکید بر ضرورت روز آمد سازى آگاهى و بینش طلاب جوان حوزه در عرصه مسائل سیاسى دنیاى امروز، به ویژه ایران و جهان اسلام، معتقد است: در بحث تربیت سیاسى طلاب جوان باید به گونه اى عمل شود که خود به خود انگیزه و دغدغه لازم در طلاب جهت افزایش بینش و دانش سیاسى، ایجاد شود که اگر این انگیزه به وجود آمد، قطعاً آگاهى هاى آنان در عرصه مسائل و رویدادهاى سیاسى افزایش صحیحى خواهد داشت و علاوه بر آن خود به عاملى براى رشد مشارکت آنها در این عرصه براساس رهنمودهاى حکیمانه مقام معظم رهبرى مبدل مى گردد.&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;باید به سمت پوپایى سیاسى در حوزه برویم&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;سید محمد سجاد موسوى، طلبه پایه هفتم نیز بر ضرورت تربیت سیاسى در حوزه تأکید کرد و ابراز داشت: ضرورت این مسئله آن قدر روشن و بدیهى است که فکر نکنم طلبه اى راجع با اصل قضیه مخالف باشد و اگر هم مخالف است به واسطه پیامدها و عوامل فرعى ماجراست؛ چرا که هر عقل سلیمى مى پذیرد که پویایى سیاسى در حوزه که حقیقتاً مظهر و نماد انسان سازى در بستر دین مى باشد، یک امر اساسى است، اما نباید از این نکته هم غافل شد که ورود به هر بحثى بدون کار پژوهشى و بدون عیب زدایى و رفع نواقص و آفات آن، بسیار خطرناک است به همین خاطر بنده معتقدم که نخبگان و تصمیم گیران کلان حوزه باید بیایند قبل از هر چیز روى کم و کیف این قضایا بحث کنند و آسیب هاى آن را در بیاورند و در رفع آنها بکوشند و پس از آن بیایند طرح بدهند و وارد حوزه عمل شوند.&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;نیاز سنجى و علمى نگرى نباید فراموش شود&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;مهدى جوازى، طلبه پایه نهم نیز با اشاره به اهمیت بحث آسیب شناسى آموزش سیاسى در حوزه تصریح کرد: به اعتقاد من یکى از آفاتى که در این خصوص مى تواند وجود داشته باشد این است که بدون برنامه ریزى منسجم و بدون شناخت نیازها، یک کار مقطعى و عجله اى در قالب یک طرح با هر عنوانى به مرحله اجرا در آید که طبعاً در این جور کارها، تحلیل مسائل سیاسى چندان با واقعیات علمى و نیازهایى که عرض کردم، مطابقت ندارد و همین مى شود که نظرات سلیقه اى و صرفاً احساسى جاى یک کار علمى و پژوهشى مؤثر و بلند مدت را مى گیرد و همه این مشکلات دست به دست هم مى دهد تا عده اى با طرح این مباحث که «سیاست پدر و مادر ندارد» و «به ما چه که وارد دنیاى پر دغل سیاست شویم» از اساس منکر قضیه شوند و به مخالفت و عناد با آن بپردازند.&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;فعلا به صلاح طلبه ها نیست!&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;رسول اشرفى، طلبه پایه سوم بر خلاف اکثر مصاحبه شوندگان معتقد است توجه جدى به مباحث سیاسى نه تنها سود و فایده اى براى طلاب جوان ندارد بلکه آنها را از درس و بحث خود مى اندازد.&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;وى در ادامه صحبت هایش اظهار داشت: من نمى گویم که از بیخ و بن نباید به مسئله آموزش و تربیت سیاسى در حوزه پرداخت کما اینکه بزرگان ما از مرحوم سید جمال الدین اسد آبادى بگیر تا شهید مطهرى و حضرت امام (ره) حرفشان این بوده که نباید اندیشه سکولار جدایى دین از سیاست وارد دستگاه روحانیت شود اما من حرفم این است که چون هنوز براى ما طلبه هاى مقاطع پایین تر، ورود به این بحث ها ممکن است خطرزا باشد و از سویى در روند تحصیلى ما خلل وارد کند، من فعلاً با این رویکرد براى طلبه هاى جوان مخالفم.&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;آفات و آسیب هاى تربیت سیاسى در حوزه&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;حجت الاسلام و المسلمین دکتر مهاجرنیا، با اشاره به دیدگاه موجود در میان برخى حوزویان که مخالف رویکرد حوزه به سمت سیاست هستند، گفت: فرعى دانستن حوزه سیاست و کم اهمیت جلوه دادن زندگى سیاسى، ضعف در جرأت و جسارت و تهور در حوزه اندیشه و عمل سیاسى، فعال نبودن بخش هایى از رویکرد سیاسى و تورم در بخش هاى عبادى،تمرکز در حکم شناسى و واگذارى موضوع شناسى، متأخر بودن از شرایط سیاسى و واقعیات عینى، حاشیه گرایى و دور بودن از مسائل جامعه از جمله مهم ترین آفات و آسیب هاى نظام آموزشى حوزه، در امر پرورش سیاسى طلاب محسوب مى شود که البته به اینها موارد دیگرى چون ذهنى گرایى، عدم تشخیص اولویت ها، گسترش مفاهیم و پدیده هاى سیاسى جدید و عدم آمادگى در پاسخگویى ،کندى فرآیند آموزشى و فعال نبودن بخش هایى از رویکرد سیاسى و تورم بیش از حد در بخش هاى عبادى را مى توان اضافه کرد.&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;تحقق خواسته رهبر معظم انقلاب مبنى بر تحول در حوزه&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;قاسم ملکى، طلبه پایه نهم با اشاره به خواسته اخیر رهبر معظم انقلاب در دیدار چندى پیش حوزویان با ایشان مبنى بر ضرورت توجه به تحول در حوزه و مدیریت آن گفت: یکى از بخش هایى که به طور جدى باید در مقوله تحول حوزه مطرح شود همین مسئله آموزش و تربیت سیاسى است. شما مى دانید که سیاست در هر جامعه اى به نوعى یکى از لوازم پویایى و زنده بودن آن است و ما هم چه در کلام حکیمانه رهبرى و چه در بیان بزرگان دیگرى چون امام راحل عظیم الشان تأکید بر این محورها را مى بینیم. مثلاً حضرت امام (ره) جمله اى دارند به این مضمون که روحانیت باید سیاسى باشد و آگاه به مسائل، نه اینکه سیاسى کار باشند یا این که رهبرى بارها در سخنرانى هاى مختلف در سال هاى اخیر بر ضرورت ارتقاى آگاهى و درک و قدرت تحلیل سیاسى در حوزه تأکید کرده اند و یا بالاتر از همه اینها امیرالمؤمنین على(ع) مى فرمایند: فرزند زمان خویش باشید؛ همه اینها نشان مى دهد ما به عنوان طلبه اى که قرار است در جامعه محور هدایت باشد، چاره اى نداریم مگر اینکه به این سمت و سو برویم. چرا که هم شرایط جامعه این اقتضا را دارد و هم این که براى پاسخ گویى به مسائل و شبهات مطروحه در جامعه باید به سلاح اندیشه مترقى سیاسى برگرفته از اسلام و مکتب اهل بیت (ع) مجهز شویم و دید باز و وسیع در این حیطه مى تواند بسیار کمک بکند.&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;سیاسى کارى؛ آفت جدى تربیت سیاسى &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;سید جواد سید کریمى، طلبه پایه هشتم نیز با بیان اینکه عقل و منطق به ما مى گوید که در روزگار کنونى حوزه هاى علمیه باید در کنار توجه به فقه و اصول و فلسفه و تفسیر و غیره به طرح تربیت سیاسى نیز اهمیت خاصى بدهد، گفت: یک نگرانى که در این خصوص وجود دارد و بسیارى از فضلاى حوزه هم بدان اشاره مى کنند این است که مبادا مراکز حوزوى با افراط گرایى در حوزه هاى سیاسى به مرکز فعالیت و پاتوق فلان گروه و حزب سیاسى تبدیل شوند و براى جلوگیرى از وقوع چنین مسائلى مدیران حوزه باید با شناخت کامل و برنامه ریزى لازم، اولاً نیاز طلاب را به این قبیل مباحث بسنجند و ثانیاً ساز و کار مورد نیاز را براى فراهم آمدن یک محیط مناسب براى تقویت اندیشه سیاسى طلاب جوان مهیا کنند. در غیر این صورت شک نکنید که ما به بیراهه خواهیم رفت و از آن مسیر اصلى و قصد اولیه منحرف خواهیم شد.&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;سیاست گذارى درست باید صورت گیرد&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;حجت الاسلام لک زایى با اشاره به حساسیت و پیچیدگى خاص مسائل سیاسى، در همین باره گفت: کسى که در حوزه، آموزش لازم را در حیطه مسائل سیاسى ندیده باشد، اگر وارد مقوله پر هیاهوى سیاست شود، چون ورود او، ورودى بدون بصیرت بوده، مصداق آن جمله امام صادق(ع) مى شود که رهرو بى بصیرت هر چقدر هم سرعتش بیشتر شود، در حقیقت گمراه تر شده و از مقصد دورتر شده است. با عنایت به این مسئله، ضرورت توجه ویژه مسئولان به برنامه ریزى در این خصوص روشن مى شود. چرا که اگر برنامه ریزى مناسبى براى طلاب جوان در حوزه وجود نداشته باشد نتیجه این مى شود که خودشان دست به حرکت هاى خود جوشى بزنند و همین امر باعث شود گاهى اوقات که یک جناح سیاسى خاص در برخى مدارس ما شکل بگیرد و این اصلاً مطلوب نیست ولو آن که شاید به طور تصادفى نتیجه اش هم خوب باشد و لذا مسیر درست و رویکرد مطلوب آن است که سیاستگذارى و برنامه ریزى منسجم شکل بگیرد.&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;یک پیشنهاد؛ ستاد ویژه تربیت سیاسى طلاب جوان ایجاد شود&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;وى همچنین با اشاره به لزوم بهره گیرى از کارشناسان زبده علوم سیاسى، به ویژه از تحصیلکردگان حوزوى در این رشته به منظور تربیت سیاسى طلاب جوان، بیان داشت: بنده در این خصوص دو پیشنهاد دارم یکى این که مراکز مختلف حوزوى با هماهنگى با یکدیگر بیایند یک ستاد ویژه تربیت سیاسى طلاب و یا شوراى عالى به همین نام در حوزه ایجاد کنند و دیگر این که با توجه به گستردگى و تنوع مباحث سیاسى، رشته هاى تخصصى علوم سیاسى با عنایت به گرایشات فراوان آن در حوزه ایجاد شود. البته پیشنهادهاى دیگرى نیز وجود دارد که ما آنها را در قالب طرح تربیت سیاسى طلاب آورده ایم و آماده ارایه آن به مدیریت محترم حوزه و برزگان هستیم.&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;نخبه پرورى سیاسى؛ نیاز راهبردى حوزه&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;مدیر پژوهشکده علوم و اندیشه سیاسى دفتر تبلیغات اسلامى حوزه علمیه قم در پایان صحبت هاى خود با ما ،با تأکید بر این که نخبه پرورى سیاسى علاوه بر دانشگاه، باید در حوزه نیز مورد توجه قرار گیرد، خاطرنشان کرد: اگر ما بخواهیم که طلاب جوانمان در آینده نظام نقش راهبردى داشته باشند، چاره اى نداریم جز آن که در حوزه بر روى آموزش و تربیت سیاسى آنها کار کنیم و لذا نخبه پرورى سیاسى ضرورتى است که از نیاز راهبردى حوزه به نیروهاى جدید متفکر و پویا نشأت مى گیرد.&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;وضعیت مطلوب رویکرد سیاسى در حوزه چیست؟!&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;حجت الاسلام دکتر مهاجرنیا نیز با بیان اینکه اصالت دینى، بنیاد معرفتى، هویت فرهنگى و صنفى واحد و آزادمنشى و تکثر گرایى چهار ویژگى اساسى نظام آموزشى و دستگاه تولید اندیشه دینى حوزوى به شمار مى آید، در خصوص وضعیت مطلوب در رویکرد سیاسى حوزه ابراز داشت: حوزه ابتدا باید رویکرد سیاسى را در نصوص فعال کند و از این طریق سیگنال هاى سیاسى نص را به جریان هاى فکرى سیاسى فعال تبدیل نماید. در مرحله بعد دستگاه تولید اندیشه را با توجه به ویژگى هایى که عرض کردم، فعال کند. سپس تکلیف خود را با چالش هایى اساسى چون «اصالت هاى دینى در کنار حادثه هاى زمانى»، «مسائل ذهنى و اندیشه اى در کنار واقعیات عینى جامعه» و «اصول ثابت در کنار ساز و کارهاى متغیر زمانى»، مشخص کند تا با رفع آسیب ها و نواقص در نظام فکرى، آموزشى، پژوهشى و تبلیغى، مجموعه حوزه و روحانیت بتواند به طور فعال رهبرى حوادث را بدست گیرد. در چنین شرایطى مى توان گفت که حوزه متحول شده و آن چه را که مقام معظم رهبرى بر آن تأکید دارند، محقق شده است.&lt;/P&gt;</description>
<pubDate>Mon, 09 Nov 2009 11:30:19 GMT</pubDate>
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<title>گزارش خبرگزاری فارس خبرگزاری مهر،</title>
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<description>&lt;DIV class=nwstxtlinkicons&gt;&lt;A class=lnk href=&quot;http://www.farsnews.net/printable.php?nn=8808180932&quot; target=&apos;\&quot;_blank\&quot;&apos;&gt;&lt;IMG alt=&quot;نسخه چاپي&quot; src=&quot;http://www.farsnews.net/shares/img/print.gif&quot; width=25 border=0&gt; &lt;/A&gt;&lt;A class=lnk href=&quot;http://www.farsnews.net/mail.php?nn=8808180932&amp;tt=&quot; target=&apos;\&quot;_blank\&quot;&apos; كرسي نظريه‌پردازي «نظام دفاعي اسلام» برگزار مي‌شود??&gt;&lt;IMG alt=&quot;ارسال به دوستان&quot; src=&quot;http://www.farsnews.net/shares/img/email.gif&quot; width=25 border=0&gt; &lt;/A&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;DIV class=nwstxttoppane&gt;
&lt;DIV class=nwstxtnewsinfo&gt;
&lt;DIV class=nwstxtrotitr&gt;به همت پژوهشگاه فرهنگ و انديشه اسلامي:&lt;/DIV&gt;
&lt;DIV class=nwstxtinfotitle&gt;كرسي نظريه‌پردازي «نظام دفاعي اسلام» برگزار مي‌شود&lt;/DIV&gt;
&lt;P class=nwstxtlead style=&quot;LINE-HEIGHT: 160%&quot;&gt;خبرگزاري فارس: كرسي نظريه‌پردازي «نظام دفاعي اسلام» با ارائه حجت‌الاسلام مهاجرنيا، مدير گروه سياست و عضو هيأت علمي پژوهشگاه فرهنگ و انديشه اسلامي، 23 آبان ماه برگزار مي‌شود.&lt;/P&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;DIV class=nwstxtpic&gt;&lt;IMG class=nwstxttoppic style=&quot;WIDTH: 131px; HEIGHT: 121px&quot; height=119 src=&quot;http://media.farsnews.com/Media/8808/Images/jpg/A0767/A0767092.jpg&quot; width=219&gt;&lt;BR&gt;&lt;/DIV&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;P class=nwstxttext style=&quot;LINE-HEIGHT: 180%&quot;&gt;به گزارش خبرگزاري فارس به نقل از روابط عمومي پژوهشگاه فرهنگ و انديشه اسلامي،‌ حجت‌الاسلام محسن مهاجرنيا، ارائه‌كننده اين نظريه پيرامون اهداف خود از پيشنهاد اين نظريه گفت: برخلاف حجم گسترده نصوص اسلامي در قرآن و روايات در باب انديشه دفاعي اسلام، مباحث اين عرصه بسيار فقير و فاقد نظام و انسجام لازم است. &lt;BR&gt;وي ادامه داد: به همين دليل، تحقيق حاضر با اين ايده طراحي شده است كه با تتبع در منابع اسلامي، الگويي از انديشه دفاعي اسلام به صورت جامع، نظام‌مند و منسجم ارائه كند. &lt;BR&gt;مهاجرنيا در خصوص عناصر تشكيل‌دهنده اين نظريه اظهار داشت: اين تحقيق  تأكيد دارد، در حالي كه تحقيقات ديگر چنين رويكردي ندارند و بيشتر بر ابعاد عملي و رفتاري مسائل دفاعي اسلام متمركز شده‌اند. &lt;BR&gt;مدير گروه سياست و عضو هيأت علمي پژوهشگاه فرهنگ و انديشه اسلامي افزود: اين تحقيق بر جامعيت رويكرد اسلام به مجموعه مسائل دفاعي و نظامي اعتقاد دارد، در حالي كه برخي از فرضيه‌ها قائل به جدايي بين مباحث امنيتي، دفاعي و جهادي هستند. خصوصيت «نظام‌مندي» از تمايزات اساسي اين فرضيه با فرضيات مشابه است. &lt;BR&gt;كرسي نظريه‌پردازي «نظام دفاعي اسلام» با داوري منوچهر محمدي و حجت‌الاسلام منصور ميراحمدي و نقد مظفري، شفيعي و اخوان كاظمي، شنبه 23 آبان‌ماه از ساعت 15 تا 17 در پژوهشگاه فرهنگ و انديشه اسلامي برگزار مي‌شود. &lt;BR&gt;علاقه‌مندان و دانش‌پژوهان براي شركت در اين نشست، در تاريخ ياد شده به نشاني تهران، خيابان شهيد بهشتي، خيابان شهيد احمد قصير (بخارست)، خيابان پژوهشگاه، پلاك دوم مراجعه كنند. &lt;BR&gt;انتهاي پيام/ &lt;/P&gt;</description>
<pubDate>Mon, 09 Nov 2009 11:10:54 GMT</pubDate>
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<title>و رهبرى در انديشه سياسى فارابى (2)- از سایت راسخون</title>
<link>http://mohsen43.blogfa.com/post-97.aspx</link>
<description>&lt;P dir=rtl&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=left&gt;نویسنده : محسن مهاجرنیا&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt; اوصاف و شرايط ولايت فقيه (رئيس سنت)&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;الف ـ شرط حكمت &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;پيش از اين در مورد رئيس اول گفتيم كه فيلسوف از راه كمال قوه ناطقه و نبى از راه كمال قوه متخيله به مقام حكمت مى رسند و جمع آن دو در رئيس اول ضرورى است زيرا او با عقل فعال در ارتباط است و ((واضع نواميس)) و شريعت مى باشد. در مورد رئيس مماثل بر اساس تفكر شيعى هر دو بعد حكمت وجود دارد با اين تفاوت كه ارتباط با عقل فعال و فرشته وحى براى بيان ((تشريع)) نيست بلكه براى تبيان و تشريح است زيرا بعد از نبى مكرم و خاتم الانبيإ (ص) پرونده تشريع و مإموريت تشريعى جبرئيل به پايان رسيده است و اما در مورد رئيس سنت پيش از اين بيان شد كه او با عقل فعال و فيض وحيانى در قوه متخيله مرتبط نيست پس بطور مسلم او حكيم به اين معنا نيست و اما حكمت به معناى فلسفه يعنى كمال قوه ناطقه رئيس سنت مى تواند از آن برخوردار باشد اما اين كه آيا شرط اساسى آن است يا خير؟ نياز به بيان بيشتر دارد. فارابى در ((آرإ اهل المدينه الفاضله)) مى گويد يكى از شرايط رئيس سنت آن است كه بايد حكيم باشد.(34) اطلاق در بيان فارابى موجب ابهام در مفهوم رئيس سنت شده است و همين ابهام سبب شده است كه بسيارى از محققان معتقد شوند انديشه فارابى و مدينه فاضله او آرمانى و اوتوپيايى است و در كره زمين رهبر حكيم متصل به روح القدس و عقل فعال يافت نمى شود. بنابر اين به نظر مى رسد علاوه بر اين كه بعد وحيانى حكمت براى رئيس سنت لازم نيست بلكه بعد دوم آن به معناى فلسفه نيز ((وصف ترجيحى)) است نه ((شرط اساسى)). فارابى در جاى ديگر مى گويد: ((و اما التابعه لها التى رئاستها سنيه فليس تحتاج الى الفلسفه بالطبع))(35) رياست تابعه رئيس اول كه رياستش بر اساس سنت است بالطبع نيازى به فلسفه ندارد. اين سوال مطرح مى شود كه پس چرا در ((آرإ اهل المدينه الفاضله)) آن را شرط كرده است به نظر مى رسد جواب آن اين است كه فارابى اعتقاد دارد روساى جانشين بايد حتى المقدور واجد شرايط رئيس اول باشند, لذا پيشنهاد مى كند كه آنها هم بهتر است متصف به حكمت و ساير شرايط رئيس اول باشند.&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;((ان الاجود و الافضل فى المدن و الامم الفاضله ان يكون ملوكها و روساوها الذين يتوالون فى الازمان على شرائط الرئيس الاول))(36) به نظر مى رسد اين تعبير وجه جمع مناسبى است بين آرإ اهل المدينه الفاضله كه حكمت را شرط كرده است و بين ((فصول مدنى)) كه آن را شرط رئيس سنت ندانسته است و بين ((احصإ العلوم))(37) كه به صورت كلى پيشنهاد تبعيت رئيس سنت از شرايط رئيس اول را مى دهد. در نتيجه حكمت به معناى فلسفه جزء شرايط ترجيحى است و عدم آن خللى در تحقق رياست سنت و ولايت فقيه ايجاد نمى كند.&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;ب ـ شرط فقاهت &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;همانطورى كه گذشت رئيس سنت به دليل عدم ارتباط با وحى جزء ((واضعان نواميس)) نيست و نمى تواند واضع شريعت باشد او صرفا استمرار دهنده رسالت رئيس اول و رئيس مماثل است و موظف است شريعت و رياستى كه به او واگذار شده بدون كم و كاست و تغيير حفظ نمايد. ((لايخالف و لايغير بل يبقى كل ما قدره المتقدم على حاله))(38) اما چون مقتضيات زمان و مكان و مصالح امت در هر عصرى متفاوت است و بالطبع در عصر رئيس سنت ممكن است مسائلى به وجود بيايد كه در زمان واضع شريعت و رئيس اول مطرح نبوده است در اينجا معلم ثانى وظيفه رئيس سنت مى داند كه از طريق اصول و قواعد كلى شريعت به استخراج و استنباط احكام و قوانين مورد نياز جامعه بپردازد. ((ينظر الى كل ما يحتاج الى تقدير ممالم يصرح به من تقدم فيستنبط و يستخرج عن الاشيإ التى صرح الاول بتقديرها))(39) و چون معرفت بر نحوه استنباط احكام در علم فقه بحث مى شود فارابى تاكيد مى كند كه رئيس سنت ضرورتا به صناعت فقه نيازمند است و خودش هم بايد فقيه باشد. ((فمن كان هكذا فهو فقيه)).(40) او در تعريف صناعت فقه مى گويد: ((صناعتى است كه انسان را قادر مى سازد تا در مواردى كه واضع شريعت تصريح به حكم نكرده با كمك آن به استنباط و استخراج احكام بپردازد. ((صناعه الفقه و هى التى يقتدر الانسان بها على ان يستخرج و يستنبط صحه تقدير شىء شىء ممالم يصرح واضع الشريعه بتحديده عن الاشيإ التى صرح فيها بالتقدير فى الامه التى لهم شرعت)).(41)&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;معلم ثانى فلسفه فقاهت را از محدوده فقه مصطلح و رايج در عصر خويش خارج و جامعيت آن را موكول به هشت شرط اساسى مى داند:(42)&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;1 ـ شناخت شريعت :&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;رئيس فقيه براى حفاظت از شريعت و براى اين كه بتواند بر اساس آن اجتهاد نمايد بايد تمام ((اقوال)) و ((اعمال)) واضع شريعت را بشناسد;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;2 ـ شناخت مقتضيات زمان وضع شريعت: &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;فقيه بايد موقعيت و شرايطى را كه واضع اوليه در آن قرار داشته و بر اساس آن شريعت را جعل نموده بشناسد;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;3 ـ شناخت ناسخ و منسوخ در شريعت: &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;فقيه براى اداره نظام سياسى بايد آخرين حكم و نظر شارع را بداند تا بر اساس آن استنباط و اجتهاد نمايد. بنابر اين آگاهى او بر ناسخ و منسوخ ضرورى است تا بر مبناى ناسخ عمل كند و در دام منسوخ نيافتد;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;4 ـ آشنايى با لغت و زبان رئيس اول:&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;فهم متون و خطابات واضع شريعت و رئيس اول بدون آگاهى بر زبان محاوره اى او مقدور نيست, لذا فقيه جامع الشرايط لازم است بر ادبيات و محاورات او آشنا باشد ((عارفا باللغه التى بها كانت مخاطبه الرئيس الاول)) ;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;5 ـ آشنايى با عادات زمان رئيس اول: &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;شكى نيست كه عادات و رسوم زمان خطاب در وضع آيين و شريعت انعكاس زيادى دارد و فقيه براى درك شريعت و ايجاد زمينه اجتهاد ناچار است بر عادات و رسوم آن زمان بويژه در كاربردهاى زبانى آنها مطلع باشد;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;6 ـ آشنايى با استعمالات و استعارات زمان رئيس اول: &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt; استعمالات مختلف زبان و مفاهيم مشترك زمان وضع قوانين و شريعت براى فقيه ضرورى است زيرا او براى فهم متون دينى بايد بتواند حقيقت را از مجاز, مطلق را از مقيد و عموم را از خصوص و محكمات را از متشابهات تمييز دهد;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;7 ـ شناخت مشهورات زمان خطاب: &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;بدون ترديد فهم بسيارى از مسائل در متون دينى بويژه مسائل سياسى و اجتماعى مبتنى بر مشهورات و مقبولاتى است كه در زمان وضع شريعت وجود داشته است و ممكن است در زمان رئيس سنت و فقيه ماهيت آن تغيير كرده باشد بدين جهت فقيه براى درك درست و اجتهاد صحيح خود بايد بر آن مشهورات آگاهى داشته باشد;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;8 ـ آشنايى با روايت و درايت: &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;فقيه بايد با گفتار و كردار رئيس اول كاملا آشنا باشد زيرا مجموعه گفتار و كردار او شريعت را تشكيل مى دهد. فارابى نحوه آشنايى با گفتار و كردار رئيس اول را به دو صورت طرح كرده است: يكى اين كه رئيس فقيه بالفعل معاصر با رئيس اول باشد و يا قبلا جزء اصحاب او بوده, از نزديك مشاهده و استماع كرده در اين صورت همان براى او حجيت دارد و بر اساس آن عمل مى كند. صورت ديگر اين است كه زمان فقيه از زمان رئيس اول فاصله زياد دارد در اين جا فقيه بايد با انواع اخبار و روايات مشهور و موثق و مكتوب و غير مكتوب آشنا باشد تا بتواند قول صحيح را از سقيم تشخيص دهد.&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;ج ـ شرط دين شناسى: &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;چون فقيه جامع الشرايط حق جعل و وضع قانون و شريعت را ندارد و در واقع همه ره آورد او منقولاتى است كه مستند به دين و شريعت است(43) و به تعبير معلم ثانى ((لان الفقه يإخذ الآرإ و الافعال التى صرح بها واضع المله مسلمه و يجعلها اصولا فيستنبط منها الاشيإ اللازمه عنها))(44) يعنى فقه كه از دو بخش آرإ و افعال تشكيل شده, از اصول مسلمى اخذ گرديده كه واضع مله و شريعت به آنها تصريح نموده است و فقيه از طريق آن اصول مسائل لازم را اجتهاد و استنباط مى كند. بنابر اين واضح است كه دين و به اصطلاح فارابى ((مله)) مقدم بر فقه است.(45) از اين جاست كه فارابى علاوه بر شرط فقاهت و آشنايى با ابزار و شرايط و لوازم آن تصريح مى كند كه رئيس سنت بايد دين شناس باشد: (( عارفا بالشرايع و السنن المتقدمه التى اتى بها الاولون من الائمه و دبروا بها المدن))(46) او بايد نسبت به شريعت و سنتى كه پيشينيان وضع كرده اند و به واسطه آن به تدبير و سياست مدن پرداخته اند بشناسد تا بتواند نظام سياسى عصر خويش را بهتر تدبير و رهبرى نمايد&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;د ـ شرط چهارم: زمان شناسى: &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;بر خلاف رئيس اول كه براى تدبير نظام سياسى و هدايت و رهبرى مردم به سوى سعادت تنها لازم است زمان خود را بشناسد رئيس سنت و فقيه جامع الشرايط علاوه بر شناخت عصر خويش و تشخيص مصالح امت معاصر خود, بايد شرايط و مقتضيات دوران رئيس اول را هم بشناسد.(47)&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;فارابى مى گويد: رئيس سنت و فقيه جامع الشرايط بايد از ((جودت رإى)) و تعقل در همه حوادث واقعه اى كه عمران و آبادى مدينه و زمان او به آن وابسته است و در سيره پيشينيان نبوده است برخوردار باشد: چون او موظف است اصول و كليات شريعت را رعايت كند: ((محتذيا حذو الائمه الاولين)) بناچار بايد زمان وضع شريعت را نيز بشناسد: ((ان يكون عارفا بالشرايع التى انما شرعها الاول بحسب وقت ما))(48)&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;ه ـ شرط پنجم: قدرت هدايت: &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;اگرچه رئيس سنت انسان استثنايى متصل به عقل فعال نيست, تا بتواند بطور كامل سعادت و هدايت را براى امت ترسيم نمايد اما در عصر خويش در هرم قدرتى است كه فارابى بر مقياس سلسله مراتب هستى در مدينه معمارى كرده است. لذا به تبع رئيس اول وظيفه دارد تا امت را با ((جودت ارشاد)) به دين و شريعت رئيس اول هدايت نمايد و چون سطح فكرى امت مختلف است برخى را با برهان و برخى را با اقناع از راه تمثيل و محاكات ارشاد مى نمايد.(49)&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;و ـ شرط ششم: قدرت بر جهاد:&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;اين شرط از جمله شرايط مشترك بين رئيس اول و رئيس فقيه و ساير مراتب رياست است و علاوه بر شرطيت توانايى جسمانى فارابى آن را جزء اوصاف روسا نيز مطرح كرده است. ((رئيس بايد تام الاعضا باشد و قوتهاى آن در انجام كارهايى كه مربوط به اعضا است او را يارى نمايند و هرگاه از عضوى از اعضاى خود كارى كه در وظيفه آن است بخواهد به آسانى بتواند انجام دهد))(50) و در خصوص رئيس سنت آورده است كه تن او در مباشرت اعمال جنگى به خوبى مقاوم باشد و در اين كار ثابت قدم و استوار باشد و اين در صورتى محقق مى شود كه صاحب صناعت و فنون جنگى باشد.(51) بنابر اين سلامت جسمانى و قدرت بر جهاد هم شرط ثبوتى است و هم شرط اثباتى است به همين دليل فارابى آن را هم در صفات و هم در شرايط مطرح كرده است و آن به اين معنا است كه اگر شخصى واجد همه شرايط رياست باشد ولى قادر بر جهاد نباشد او به هيچوجه نمى تواند رئيس بشود و اگر در اثناى رياست بر اثر ضعف جسمانى قدرت بر جهاد زايل شود هم ثبوتا و هم تحققا شرط و صفت رياست از بين مى رود و رئيس منعزل مى گردد. بنابر اين در همه مراحل رياست استمرار اين شرط لازم است زيرا براى سركوب دشمنان خارجى و تإديب طاغيان داخلى رئيس نياز به قدرت نظامى دارد. فارابى در تشريح قدرت نظامى در تحصيل السعاده مى فرمايد: ((هى القوه على جوده التدبير فى قوه الجيوش و استعمال آلات الحرب و الناس الحربيين فى مغالبه الامم و المدن))(52) عبارت است از بهترين شيوه تدبير در به كارگيرى سپاهيان و استفاده از سلاحها و ابزار جنگى و مردمان جنگجو براى پيروزى بر ساير امتها و مدينه ها .&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;علاوه بر شرايط ششگانه فوق, فارابى براى رئيس سنت همان اوصاف دوازده گانه ((آرإ اهل المدينه الفاضله)) يا شانزده گانه ((تحصيل السعاده)) رئيس اول را لازم مى داند و چون اين اوصاف طبعى و مربوط به مقام تحقق و اثبات هستند و روسا در مقام عمل و تدبير سياسى بايد متصف به آنها باشند بنابر اين از اين جهت بين رئيس اول و ساير مراتب رياست فرقى وجود ندارد.&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;نوع چهارم رهبرى: روساى سنت &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;در صورتى كه يك انسان واجد شرايط رياست سنت يافت نشود فارابى در ((آرإ اهل المدينه الفاضله)) پيشنهاد رياست دو نفرى را مطرح مى كند چون روى شرط ترجيحى حكمت تاكيد دارد, مى گويد: اگر يك نفر از اعضاى رهبرى حكيم باشد و نفر دوم شرايط پنجگانه ديگر را داشته باشد, به شرط همكارى و سازگارى آنها رهبرى سياسى را در يكى از سه نظام سياسى فارابى به عهده مى گيرند چون اين نوع رهبرى ادامه رياست سنت است, لذا تمام شرايط (حكمت ((ترجيحى)) ـ فقاهت ـ دين شناسى ـ زمان شناسى ـ هدايتگرى و قدرت بر جهاد) بايد در اين دو رئيس موجود باشد, و اما ممكن است اين سوال مطرح شود كه آيا نبودن همه شرايط در يك نفر منجر به جدايى حوزه هاى ((دين)) و ((فقاهت)) از ((حكمت)) و ((سياست)) نخواهد شد كه ما اين بحث را بطور تفصيلى در جاى ديگر آورده ايم و به جهت اختصار به آنجا ارجاع مى دهيم.(53) علاوه بر شرايط, تمام ويژگيهايى كه براى رئيس اول و مماثل و رئيس سنت بيان شد در هر دو رئيس لازم و ضرورى است. فارابى در فصول مدنى نظم ((آرإ اهل المدينه الفاضله)) را در مراتب رهبرى به هم زده است و بعد از رئيس اول و مماثل (ضمنى) روساى افاضل را مقدم كرده است سپس روساى سنت و در پايان رئيس سنت را آورده است و بر خلاف ((آرإ)) كه اعضاى رهبرى دو نفر هستند در ((فصول منتزعه)) تعداد اعضا به تعداد شرايط افزايش داده شده است يعنى شش نفر عضو شوراى رهبرى مى شوند.&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;نوع پنجم رهبرى: روساى افاضل &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;اين نوع رهبرى عبارت است از شورايى مركب از شش نفر كارشناس كه در صورت فقدان ((روساى سنت)) رهبرى و اداره جامعه را به دست مى گيرند. چون اين شورا جانشين روساى سنت است بالطبع همه شرايط آنها را بايد داشته باشد. بنابر اين چون شش شرط وجود داشت هر كدام از اعضاى شورا بايد حداقل يك شرط را داشته باشد و در صورتى كه بعضى از آنها بيش از يك شرط را داشته باشند به همان تعداد اعضاى شوراى رهبرى تقليل خواهد يافت و ممكن است به سه نفر هم برسد. فارابى در ((فصول منتزعه)) اين نوع رهبرى را ادامه رهبرى رئيس اول آورده است و ظاهرا شرايط او را براى اعضاى شورا لازم شمرده است.(54) معلم ثانى علاوه بر شرايط ششگانه اعضاى شورا براى تركيب شورا هم يك شرط اساسى آورده است و آن عبارت است از هماهنگى و سازگارى در اداره نظام سياسى ((و كانوا متلائمين))(55) ظاهرا فارابى خود به اين مهم توجه داشته است كه ممكن است تعدد اعضاى رهبرى و تفكيك شرايط به تفكيك حوزه هاى ((دين)), ((فقاهت)), ((حكمت)) و ((سياست)) منجر بشود لذا قيد فوق را آورده است و معناى آن اين است كه اگر واجدين شرايط رهبرى با هم سازگار و همسو نباشند و امكان جايگزينى و يا سازگارى آنها هم نباشد اين مرحله از رهبرى خودبه خود منتفى خواهد شد.&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;وظايف رهبرى در نظام سياسى فارابى &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;به جهت اختصار به عناوين اكتفا مى شود و تفصيل آن به زمان ديگر موكول مى شود.&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;1 ـ تعليم و تربيت اهل مدينه(56);&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;2 ـ ارشاد و هدايت مردم(57);&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;3 ـ كنترل اخلاق و ترويج ارزشها در جامعه(58);&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;4 ـ حفظ مصالح نظام(59);&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;5 ـ تدوين, استنباط و تغيير قانون(60);&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;6 ـ حفظ سلسله مراتب جامعه(61);&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;7 ـ اصلاح شهروندان(62);&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;8 ـ توزيع قدرت(63);&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;9 ـ تقسيم كار اجتماعى(64);&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;10 ـ دفع شرور و آفات(65);&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;11 ـ حفظ تنوع و تكثر در جامعه(66);&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;12 ـ ايجاد امنيت در جامعه(67);&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;13 ـ به سعادت رساندن جامعه و افراد(68);&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;14 ـ ايجاد عدالت(69);&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;15 ـ جنگ و صلح با دشمنان(70);&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;16 ـ توجه به مسائل مالى و توليدى جامعه(71).&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;منابع :&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;1 ـ فارابى, آرإ اهل المدينه الفاضله, تحقيق دكتر البير نصرى نادر ـ چاپ ششم, انتشارات دارالمشرق, بيروت 1991 .&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;2 ـ &quot; , احصإالعلوم, تحقيق عثمان محمد امين, چاپ اول, مطبعه السعاده, مصر,&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;1350 ق .&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;3 ـ &quot; , تحصيل السعاده, تحقيق دكتر جعفر آل ياسين, انتشارات دارالاندلس, بيروت,&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;1403 ق .&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;4 ـ &quot; , التحليل, تحقيق دكتر رفيق العجم, انتشارات دارالمشرق, بيروت, 1986 م . &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;5 ـ &quot; ,التنبيه على سبيل السعاده, تحقيق دكتر جعفر آل ياسين, انتشارات حكمت, تهران, 1371 ش .&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;6 ـ &quot; , التوطئه, تحقيق دكتر رفيق العجم, انتشارات دارالمشرق, بيروت, 1985 م . &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;7 ـ &quot; , الجدل, تحقيق دكتر رفيق العجم, انتشارات دارالمشرق, بيروت, 1986 م .&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;8 ـ &quot; , الجمع بين رإى الحكيمين, تحقيق دكتر البير نصرى نادر, انتشارات دارالمشرق, بيروت, 1405 ق .&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;9 ـ &quot; , الحروف, تحقيق دكتر محسن مهدى, انتشارات دارالمشرق, بيروت, 1990 م .&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;10 ـ &quot; , السياسه المدينه, تحقيق دكتر فوزى مترى نجار, المطبعه الكاثوليكيه, بيروت, 1964 م .&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;11 ـ &quot; , السياسه, تحقيق يوحنا قمير, دارالمشرق, بيروت .&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;12 ـ &quot; , فصول منتزعه, تحقيق دكتر فوزى مترى نجار, دارالمشرق, بيروت, 1971 م . &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;13 ـ &quot; , فضيله العلوم, چاپ اول, هند, حيدرآباد دكن, دائره المعارف النظاميه,&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;1340 ق. &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;14 ـ &quot; , القياس, تحقيق دكتر رفيق العجم, دارالمشرق, بيروت, 1986 م .&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;15 ـ &quot; , القياس الصغير على طريقه المتكلمين, تحقيق دكتر رفيق العجم, دارالمشرق, بيروت, 1986 م .&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;16 ـ &quot; , المله , تحقيق دكتر محسن مهدى, دارالمشرق, بيروت, 1967 م .&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;17 ـ فارابى, المله الفاضله, تحقيق دكتر عبدالرحمن بدوى, انتشارات دارالاندلس, بيروت .&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;18 ـ داورى, رضا, فارابى موسس فلسفه اسلامى, انتشارات انجمن شاهنشاهى فلسفه ايران, تهران, 1356 ش .&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;19 ـ داورى, رضا, فارابى, طرح نو, تهران, 1374 .&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;20 ـ ناظر زاده كرمانى, فرناز, فلسفه سياسى فارابى, انتشارات دانشگاه الزهرا, 1376 .&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;21 ـ سجادى, جعفر, انديشه هاى اهل مدينه فاضله, اثر فارابى, انتشارات كتابخانه طهورى, تهران, 1361 .&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;22 ـ مهاجرنیا , محسن, انديشه سياسى فارابى, انتشارات دفتر تبليغات اسلامى.(در دست چاپ است )&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;پي نوشت : &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;34-آرإ اهل المدينه الفاضله, ص 129 . 35-المله, ص 60 . 36-المله, ص 60 . 37-احصإ العلوم, ص 68 .&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;38- المله, ص 50 .&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;39- همان . 40- همان .&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;41- احصإ العلوم, ص 70 .&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;42- المله, ص 51 ـ 50 .&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;43- الحروف, ص 133 .&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;44- احصإ العلوم, ص 72 ـ 71 .&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;45- الحروف, ص 131 .&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;46- فصول منتزعه ص 67, المله, ص 50 و آرإ اهل المدينه الفاضله, ص 129 .&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;47- المله, ص 51 .&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;48- المله, ص 51 .&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;49- تحصيل السعاده, ص 83 ـ 77 .&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;50- آرإ اهل المدينه الفاضله, ص 127 .&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;51- همان, ص 130 .&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;52- تحصيل السعاده, ص 81 .&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;53- بزودى ((انديشه سياسى فارابى)) از سوى نگارنده منتشر خواهد شد.&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;54- فصول منتزعه, ص 66 .&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;55- آرإ اهل المدينه الفاضله, ص 130 .&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;56- تحصيل السعاده81/78/ ـ /80 جدل /75/19/ السياسه المدينه 86/ ـ /85 آرإ/147/&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;57- آرإ اهل المدينه الفاضله / 129&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;58- فصول منتزعه40/ ـ/101/30 81 ـ/80, المله54/ ـ /46 السياسه المدينه90/ـ71/89ـ/70&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;59- آرإ اهل المدينه الفاضله / 129 &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;60- السياسه المدينه 81/ـ/80 المله45/ـ/43 تحصيل السعاده64/ـ/70/63 فصول منتزعه/67/ آرإ 146/129/&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;61- تحصيل السعاده /87/ فصول المنتزعه69/ـ/65 السياسه المدينه 84/ـ83&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;62- السياسه المدينه /106/ آرإ 126/ـ/120&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;63- احصإ العلوم65/ـ/64 المله59/ـ/56&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;64- جدل /67/ فصول منتزعه74/ـ71 / 95ـ94 / المله 59/ـ/53 آرإ 141/156/ـ/139&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;65- فصول منتزعه 74/ـ/43/33/73 السياسه المدينه /87/104/106/&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;66- تحصيل السعاده 88/ ـ /80/83 فصول منتزعه 36/99/ ـ /35 آرإ/148/&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;67- تحصيل السعاده 81/ـ/80&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;68- آرإ119/126/ـ/118 توطئه /59/ احصإالعلوم /65/ تحصيل /81/ فصول منتزعه 92/&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;69- آرإ /158/ فصول منتزعه 74/ـ100/46/71&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;70- تحصيل السعاده 74/ـ/81/70 فصول منتزعه 67/ـ78/66ـ/76&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;71- فصول منتزعه /76&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;منبع:فصلنامه علوم سیاسی /س&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;مقالات مرتبط &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;• فقه و رهبرى در انديشه سياسى فارابى (1)&lt;/P&gt;</description>
<pubDate>Sun, 11 Oct 2009 02:29:24 GMT</pubDate>
<comments>http://commenting.blogfa.com/?blogid=mohsen43&amp;postid=97</comments>
<dc:creator>mohsen43</dc:creator>
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<item>
<title>فقه و رهبرى در انديشه سياسى فارابى (1)- از سایت راسخون</title>
<link>http://mohsen43.blogfa.com/post-96.aspx</link>
<description>&lt;P dir=rtl&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=left&gt;نویسنده : محسن مهاجر( + نیا )&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;مقدمه &lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;على رغم برداشت ناصواب بسيارى از محققان و نويسندگان معاصر, كه رويكرد انديشه سياسى فارابى را كشف و شهودى پنداشته, تصور كرده اند فارابى به راهى اوتوپيايى و ماورإالارضى گام نهاده است; همچنان كه پيش از او مدينه فاضله افلاطونى, در دام آن گرفتار شده بود. راقم اين سطور را اعتقاد بر آن است كه اين تلقى, قرائتى است كه از منظر افلاطون به فارابى نظر كرده است و مع الاسف موسس فلسفه اسلامى و سياسى (1)و بزرگترين فيلسوف جهان اسلام را ناخواسته و يا ناآگاهانه به اتهام تقليد از فلسفه سياسى كلاسيك يونانى به حاشيه كشانده اند, كه اگر در اعتقادشان صائب هم باشند در عمل به خطا رفته اند. زيرا فارابى علاوه بر اخذ مكتب افلاطون, ارسطو و فلوطين و جمع بين آراى متناقض آنها(2), بخشى از آن آرا را كه با مبانى دينى ناسازگار بوده حذف نموده بخشى را بازسازى و اصلاح كرده است و آراى بسيارى از تفكر خويش بر آن افزوده است فلذا اهتمام به انديشه فارابى در قياس با انديشه افلاطون و ارسطو به مراتب از اولويت بيشترى برخوردار است .&lt;BR&gt;بر اين اساس جا دارد قرائت جديدى از انديشه سياسى وى با رهيافتى فلسفى, مورد مذاقه قرار گيرد. در اين راستا, نگارنده بعد از دو سال مطالعه و تحقيق بر روى تمام آثار موجود(3)فارابى و تحقيقات پيرامونى سعى دارد با توجه به منظومه فكرى معلم ثانى, كه تلفيقى است از عناصر زمان, عمل سياسى, اعتقاد شيعى و تفكر سياسى از زواياى مختلف, (( فلسفه سياسى)) او را مورد كنكاش و مطالعه قرار دهد.(4)و تحقيق حاضر, بخشى از اين پروژه وسيع است .&lt;BR&gt;فرضيه تحقيق اين است كه فارابى بر اساس عناصر فوق, ((مصالح)) يونانى را اخذ, و با ديدى واقعگرا, نظام مطلوب خويش را معمارى كرد. كه ماهيت اين نظام به هيچ وجه در انديشه فيلسوفان پيشين, طرح نشده است. بنابر اين اگر چه در حيات علمى او سهم زيادى از ارثيه ((نهضت ترجمه)) وجود دارد و او بر سر سفره رنگين مترجمان زيادى نشسته است و حقيقتا بزرگترين شارح و مفسر دسترنج مترجمان قرون دوم و سوم هجرى قمرى است, اما علاوه بر اخذ ((علوم عقلى)) با الهام از تفكر اسلامى شيعى, براى حل ((بحران)) زمانه خويش, پاسخهاى خود را در قالب يك منظومه منسجم فكرى, ارائه نمود. فلذا بحث ((علت فاعلى)) را از افلاطون گرفت و بر خداوند منطبق نمود. ((حادث و قديم)) او را بر ((واجب الوجود و ممكن الوجود)) و ((سعادت قصوايش)) را بر ((بهشت)) و نشئه ((مكافات عمل)) را بر ((جهنم)) و ((عقل فعالش)) را بر ((فرشته وحى)) و ((مله فاضله اش)) رابر ((اسلام)) و ((نظامهاى فاسدش)) را بر مدينه هاى ((جاهله)), ((فاسقه)) و ((ضاله)) (كه در 54 ساختار مستقل طراحى شده) منطبق نمود. ((مدنيت طبيعى)) ارسطويى را گرفت و عنصر ((كمال طلبى)) و ((افضليت خواهى)) دينى (5)را در كنار ((ضرورت بقا)) بر آن افزود و با صراحت تمام اعلام نمود كه ((من هيچ گاه مقلد ارسطو نيستم))(6). در خصوص موضوع اين تحقيق فارابى ((مدينه فاضله)) افلاطونى را اخذ نمود و آن را پايه دو نظام سياسى گسترده تر قرار داد(7)و آن را از برخى ويژگيهاى ((دولت شهرى)) يونانى منسلخ و بر ((مدينه الرسول)) منطبق نمود و آنگاه براى ترسيم ساختار رهبرى در نظام سياسى خويش ((فيلسوف ـ شاه)) را بر ((نبى)) و ((امام)) در تفكر شيعى منطبق كرد(8)اما برخلاف افلاطون در اين سطح توقف ننمود تا گرفتار آرمانگرايى اوتوپيايى بشود و فيلسوف ـ شاهش غير قابل دسترس باشد, بلكه با الهام از همان تفكر شيعى خود, بعد از نظام سياسى به رهبرى انسان حكيم متصل به وحى الهى, چهار نوع رهبرى ديگر را كه به صورت متناوب و على البدل در طول هم قرار مى گيرد, به شرح ذيل مطرح نمود:&lt;BR&gt;1 ـ رهبرى رئيس اول ـ&lt; رهبرى پيامبر اكرم (ص);&lt;BR&gt;2 ـ رهبرى, رياست تابعه مماثل ـ&lt; رهبرى امامان شيعه (ع);&lt;BR&gt;3 ـ رياست سنت (تابعه غير مماثل) ـ&lt; رهبرى فقيه جامع الشرايط;&lt;BR&gt;4 ـ رهبرى روساى سنت ـ&lt; رهبرى شوراى فقها(دو نفرى) ;&lt;BR&gt;5 ـ رهبرى روساى افاضل ـ&lt; رهبرى شوراى شش نفره فقها.&lt;BR&gt;در بخش بعدى مقاله به تفصيل انواع رهبرى بويژه سه قسم اخير را بحث خواهيم كرد. &lt;BR&gt;و اما در عرصه فقه على رغم غلبه علوم عقلى و برهانى در انديشه معلم ثانى با رهيافت فلسفى, مقام فقه را هم در ((تصنيف علوم)) و هم در ((احصإالعلوم)) ارتقا داده آن را جزء علوم اصلى قرار داد. مقام فقيهان را هم در عرصه انديشه بالا آورد و به رغم اصرارى كه بر اختصاص نخبگان و ((خواص)) جامعه به حكيمان و فيلسوفان دارد, فقيهان را در رديف آنها قرار داد و فرمود: ((يجعل الخواص اولا... الفلاسفه ثم الجدليون و السوفسطائيون ثم واضعوا النواميس ثم المتكلمون و الفقهإ...))(9)يعنى خواص به ترتيب عبارتند از فيلسوفان و جدليان, سوفسطائيان, واضعان نواميس و متكلمان و فقيهان, البته چون گرايش فكرى او بيشتر فلسفى است متكلمان و فقيهان را در رتبه پنجم خواص قرار داد و در توجيه اين تقسيم استدلال مى كند كه ((الفقيه يشتبه بالمتعقل)) فقيه در ماهيت نحوه استنباط صناعتش شبيه به متعقل و فيلسوف است و از نظر متدولوژيك و مبادى نظرى در استنباط آراى جزئى با او متفاوت است. زيرا فقيه مبادى و مقدماتش ((نقلى)) است و از منبع ((مله)) و شريعت در امور فرعى اخذ مى كند ; در حالى كه فيلسوف و متعقل مبادى و مقدماتش از ((مشهورات)) و ((تجربيات)) مى گيرد; بنابر اين فقيه به اعتبار يك شريعت خاص و مشخص جزء ((خواص)) و نخبگان فكرى قرار مى گيرد; در حالى كه فيلسوف به اعتبار كلى از خواص مى باشد.(10)سپس او بحث ((روش شناختى)) را از رابطه فلسفه و فقه به رابطه شريعت و فلسفه گسترش داد. با مبانى فلسفى خويش كه هم حقيقت ((فلسفه)) و هم حقيقت ((دين و فلسفه)) را واحد مى داند معتقد است بين آن دو هم تفاوت متدولوژيك وجود دارد.(11)او بر اين باور است كه فلسفه چون بر برهان و عمليات عقلانى متكى است, مقدم بر دين است كه بر شيوه اقناعى و تخييلى و از راه تصرف در قوه متخيله مخاطبان انجام مى گيرد. بر اين اساس تقدم فلسفه بر دين در روش و مخاطبان آن است فلذا در كتاب ((المله)) هر دو بخش ((آرا)) و ((افعال)) دينى را متإخر از آرا و افعال فلسفى مى داند.(12)و در ((الحروف)) فقه و كلام را متإخر از شريعت و مله و شريعت را هم متإخر از فلسفه مى داند. بنابر اين فقه با يك واسطه مله از فلسفه متإخر است .(13)علاوه بر اين منظر معرفت شناسانه و متدولوژيك به فقه, معلم ثانى در جايگاه فقاهت و از منظر فقهى به دفاع از حريم علوم عقلى و منطقى مى پردازد و در دوران خويش (قرن سوم و چهارم قمرى) كه اين علوم تخطئه مى شدند, مجموعه اى از ((احاديث نبوى)) را در توجيه و دفاع از آنها با شيوه اى فقيهانه مى نگارد.(14)و با اين رهيافت فقهى در عرصه علوم عقلى هر جا نياز به تبيين باشد از فقه كمك مى گيرد(15) و در عرصه سياست در زمان انقطاع فيوضات وحيانى ((فقيهان)) را تنها رهبران و هاديان مدينه فاضله اسلامى مى داند.&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;سطوح رهبرى در نظام سياسى &lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;پيش از اين در مقدمه, گفته شد كه فارابى بر اساس تفكر اسلامى و شيعى خود به پنج نوع رهبرى در پانزده شكل و ساختار حكومتى اعتقاد دارد كه در طول هم قرار مى گيرند. انواع رهبرى عبارتند از: &lt;BR&gt;1 ـ رهبرى رئيس اول ; ـ&lt;BR&gt;2 ـ رهبرى رياست تابعه مماثل ;&lt;BR&gt;3 ـ رهبرى رياست سنت ;ـ&lt;BR&gt;4 ـ رهبرى روساى سنت ;&lt;BR&gt;5 ـ رهبرى روساى افاضل .&lt;BR&gt;هر كدام از اين رهبريها مى تواند در يكى از سه شكل حكومت يعنى ((مدينه)), ((امت)) و ((معموره ارض)) مطرح باشد چون در اين مقاله موضوع ولايت فقيه است طبعا ما از طرح ((اشكال حكومت)) بى نياز هستيم و دو نوع اول رهبرى را هم استطرادا بيان مى كنيم: &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;نوع اول رهبرى: رئيس اول :&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;رياست اولى نهادى است كه در رإس هرم قدرت در يكى از سه نظام سياسى در انديشه فارابى قرار دارد و رهبرى كه در آن جايگاه قرار مى گيرد, رئيسى است كه از حاكميت برتر(16) برخوردار است و با تعابيرى از قبيل ((ملك مطلق)), ((فيلسوف)), ((واضع نواميس)), ((رئيس اول)) و ((امام)) معرفى شده است(17).&lt;BR&gt;چنين رئيسى يك انسان استثنايى است كه با عوالم بالا در ارتباط است و از دو امر فطرى و طبعى و ملكات و هيئآت ارادى بهره گرفته, مراحل كمال را پيموده, كامل شده است و به مرتبه عقل بالفعل و معقول بالفعل رسيده است. قوه متخيله اش بالطبع به نهايت كمال خود نائل آمده در همه حالات خويش آمادگى دريافت فيوضات وحيانى را از طريق ((عقل فعال)) دارد و مورد عنايت خداوند است. ((و كان هذا الانسان هو الذى يوحى اليه فيكون الله عزوجل يوحى اليه بتوسط العقل الفعال فيكون ما يفيض من الله تبارك و تعالى الى العقل الفعال يفيضه العقل الفعال الى عقله المنفعل بتوسط العقل المستفاد ثم الى قوته المتخيله فيكون بما يفيض الى عقله المنفعل حكيما و فيلسوفا و متعقلا على التمام و بما يفيض منه الى قوته المتخيله نبيا منذرا))(18). چنين انسانى از آن جهت كه فيوضات را از طريق عقل فعال به واسطه عقل مستفاد و عقل منفعل دريافت مى كند, حكيم و فيلسوف و خردمند و متعقل كامل ناميده مى شود و از آن جهت كه فيوضات عقل فعال به قوه متخيله او افاضه مى شود داراى مقام ((نبوت)) و انذار مى باشد و فارابى براى چنين انسانى خصال و شرايطى را قائل است. در ((فصول المدنى)) شرايط رئيس اول را در شش شرط بيان مى كند: 1 ـ حكيم باشد(با همان مفهومى كه بيان شد) ; 2 ـ تعقل تام داشته باشد ; 3 ـ از جوده اقناع برخوردار باشد ; 4 ـ از جوده تخييل برخوردار باشد ; &lt;BR&gt;5 ـ قدرت بر جهاد داشته باشد ; 6 ـ از سلامت بدنى بهره مند باشد.(19)&lt;BR&gt;سپس او اوصاف و ويژگيهايى را علاوه بر شرايط ششگانه فوق قائل است كه عبارت است از :&lt;BR&gt;1 ـ تام الاعضإ باشد و قوتهاى او در انجام كارهايى كه مربوط به اعضا است توانمند باشد;&lt;BR&gt;2 ـ خوش فهم و سريع الانتقال باشد;&lt;BR&gt;3 ـ خوش حافظه باشد و آنچه مى فهمد و مى بيند و مى شنود و درك مى كند در حافظه بسپارد;&lt;BR&gt;4 ـ هوشمند و با فطانت باشد و قادر به ربط مطالب و درك روابط على باشد;&lt;BR&gt;5 ـ خوش بيان باشد و زبانش گويايى داشته باشد;&lt;BR&gt;6 ـ دوستدار تعليم و تعلم باشد;&lt;BR&gt;7 ـ در خوردن و نوشيدن و منكوحات حريص و آزمند نباشد و از لهو و لعب طبعا به دور باشد;&lt;BR&gt;8 ـ كبيرالنفس و دوستدار كرامت باشد;&lt;BR&gt;9 ـ دوستدار راستى و راستگويان و دشمن دروغ و دروغگويان باشد;&lt;BR&gt;10 ـ بى اعتنا به درهم و دينار و متاع دنيا باشد;&lt;BR&gt;11 ـ دوستدار عدالت و دشمن ظلم و جور باشد;&lt;BR&gt;12 ـ شجاع و مصمم و از اراده قوى برخوردار باشد;&lt;BR&gt;13 ـ بر نواميس و عادات مطابق بافطرتش تربيت شده باشد;&lt;BR&gt;14 ـ نسبت به آيين خويش صحيح الاعتقاد باشد;&lt;BR&gt;15 ـ اعمال و رفتارش بر اساس آئينش باشد و از آنها تخلف نكند;&lt;BR&gt;16 ـ به ارزشها و فضائل مشهور پايبند باشد.(20)&lt;BR&gt;فارابى بين شرايط و خصال و ويژگيها, تفاوت گذاشته است به اين معنا كه شرايط را در ثبوت و وجود رئيس اول لازم مى داند و ويژگيها را در تحقق خارجى و اثبات او ضرورى مى شمرد.برخى از محققان بين شرايط و خصال تفكيك قائل نشده و به زحمت افتاده اند و توجه نكرده اند كه اين خصال دلايل ثبوتى نيستند و ممكن است در آثار مختلف فارابى كم يا زياد بشوند, و نبايد فورا قلم اتهام به سوى فارابى كشيد كه اين جا پيرو افلاطون است و آنجا تناقض دارد و آنجا كلامش مبهم است و هكذا. و در حالى كه معلم ثانى مكرر در بحث شرايط و اوصاف مى فرمايد: بعضى ذاتى و طبعى هستند و برخى اكتسابى و در ((آرإ)) بعد از بيان شرايط اكتسابى تصريح مى كند كه ((فهذا هو الرئيس الاول الذى ... و لايمكن ان تصير هذه الحال الالمن اجتمعت فيه بالطبع اثنتا عشره خصله))(21) با تحقق شرايط مذكور رئيس اول ثبوتا به اين مقام نايل آمده اما در خارج او به مقام ((امامت اثباتى)) نمى رسد مگر اينكه دوازده ويژگى در او بالطبع محقق شود و در تحصيل السعاده چهار خصلت ديگر بر اينها مى افزايد.&lt;BR&gt;ابهام ديگرى كه در بدو نظر ممكن است به ذهن محققان خطور كند و آنها را دچار ابهام نمايد اين است كه فارابى بعضى از مسائل را هم جزء شرايط رئيس اول آورده است و هم جزء اوصاف او كه البته با كمى تإمل ابهام برطرف مى شود. در ((آرإ اهل المدينه الفاضله)) شرايط در چهار مورد خلاصه شده (حكمت ـ قدرت بيان ـ قدرت ارشاد ـ سلامت جسمانى) كه تقريبا سه شرط آخر جزء اوصاف هم آمده است و شايد اين امر سبب شده كه برخى تصور كنند شرط ثبوت رئيس اول تنها ((حكمت)) است اما با مراجعه به تحصيل السعاده كه در واقع اثر ((فيلسوف شناسى)) و ((امام شناسى)) و ((رئيس شناسى)) فارابى است متوجه مى شويم كه وى سه شرط فوق را در تحقق و ثبوت رئيس اول اساسى مى داند; زيرا معتقد است رئيس اول كسى است كه قوت ((فضايل نظرى)) را در وجود خويش دارد و با قوت ((فضايل فكرى)) و ((فضايل خلقى)) و ((فضايل عملى)) از راه ((برهان)) و يا ((اقناع)) مى خواهد خواص و عوام جامعه را به سوى سعادت هدايت نمايد.&lt;BR&gt;بنابر اين قدرت بيان و قدرت ارشاد و سلامت جسمانى جزء تعريف ((رئيس اول)) گنجانده شده اند, اما چون اينها شرايط ثبوت هستند معلم ثانى بلافاصله خواننده را متنبه مى كند كه دچار ابهام نشود و مى فرمايد اين شرايط ثبوت در فيلسوف و امام و رئيس اول مانند شرايط طبيب هستند كه او با اتصاف به فن طبابت و قدرت بر علاج مريضان عنوان طبيب را ثبوتا احراز مى كند خواه مريض به او مراجعه كند يا مراجعه نكند. خواه وسايل و ابزار طبابت در اختيارش باشد و يا نباشد, خواه مبسوط اليد و برخوردار از توان مالى باشد و يا فقير باشد هيچ كدام ماهيت طبابت او را در ((مقام ثبوت)) خدشه دار نمى كند; اگر چه در مقام اثبات او بالفعل طبابت نكند. ماهيت كار رئيس اول نظام سياسى فارابى نيز چنين است ((الملك اوالامام هو بماهيته و بصناعته ملك و امام سوإ و جد من يقبل منه او لم بجد, اطيع او لم يطع, و جد قوما يعاونونه على غرضه او لم يجد))(22) رئيس اول و امام به ماهيت و صناعتشان رهبر هستند خواه كسى از آنها بپذيرد يا نپذيرد, اطاعت بشوند و يا نشوند, كسانى آنها را يارى كنند يا نكنند. در هر صورت آنها در مقام ثبوت عنوان فوق را دارا هستند بنابر اين بطور خلاصه چنين نتيجه گرفته مى شود كه شرايط ذكر شده براى رئيس اول در مقام ثبوت و اوصاف مذكور در مقام اثبات و خارج هستند. فارابى در ((آرإ اهل المدينه الفاضله)) بعد از بيان اوصاف و شرايط عبارتى دارد كه به نظر مى رسد مترجم محترم جناب دكتر سيد جعفر سجادى, آن را درست ترجمه نكرده است و همان منشإ اشتباه فارسى زبانان و خوانندگان ترجمه اين كتاب شده است. فارابى مى گويد: ((اجتماع هذه كلها فى انسان واحد عسر فلذا لايوجد من فطر على هذه الفطره الا الواحد بعد الواحد و الاقل من الناس فان وجد مثل هذا فى المدينه الفاضله ثم حصلت فيه بعد ان يكبر تلك الشرايط الست المذكوره قبل او الخمس منها دون الانداد من جهه المتخيله كان هو الرئيس)) در عبارت فوق فارابى ويژگيها را فطرى و طبعى و ((شرايط)) را حصولى مى داند. وجود شرايط حصولى براى ثبوت رياست ضرورى است و براى تحقق خارجى آن اوصاف فطرى و طبعى هم لازم است او مى نويسد: مشكل است كه يك نفر فطرتا همه اين اوصاف را يك جا داشته باشد ولى اگر يك نفر يافت شد كه بالطبع اين اوصاف را داشت بعد از آن كه بزرگ شد شرايط را هم تحصيل كرد او رئيس اول است. تعبير فارابى از شرايط ششگانه يا پنجگانه است كه دكتر سجادى بدون توجه به اصطلاح ((شرايط)) مى گويد ((بطورى كه ملاحظه مى شود دوازده خصلت برشمرده شد, منظور از شش شرط ممكن است شرط اول تا ششم باشد يعنى منظور شرايط فرعى است))(23) غافل از اين كه فارابى مى گويد: ((فان وجد مثل هذا فى المدينه)) يعنى اگر انسانى در مدينه واجد دوازده خصلت, يافت شد.((ثم حصلت فيه بعد ان يكبر تلك الشرايط)) سپس بعد از آن كه بزرگ شد و شرايط را تحصيل كرد, او رئيس مدينه است. ظاهرا منشإ ديگر اشتباه مترجم محترم در اين است كه فارابى در ((آرإ اهل المدينه الفاضله)) بر خلاف ((فصول منتزعه)) شرايط ششگانه را در چهار شرط تلخيص نموده ولى در ارجاع به آن تعبير به شرايط ششگانه دارد و كانه در ذهن او فصول منتزعه بوده است. خلط شرايط و اوصاف را جناب دكتر رضا داورى نيز مرتكب شده است و با مقايسه اى كه بين ((آرإ اهل المدينه الفاضله)) و ((فصول المدنى)) دارد دچار شگفتى مى شود و فارابى را متهم مى كند كه از نظر خويش عدول كرده است!((باكمال تعجب مى بينيم كه فارابى در فصول المدنى از اين نظر عدول مى كند و شرايط رئيس اول را به شش صفت تقليل مى دهد))(24) و نفرموده اند كه در كدام اثر فارابى بيش از شش شرط قائل شده است متإسفانه دكتر ناظر زاده كرمانى كه بحق جامعترين تحقيق را در فلسفه سياسى فارابى گردآورى كرده است به همين خطا دچار شده است.(25)&lt;BR&gt;بعد از آشنايى با اوصاف و شرايط رئيس اول مناسب است به موضوعاتى چون ((ساختار قدرت در نظام رياست اولى, وظايف و كار ويژه رئيس اول ((مشروعيت)) و خاستگاه رهبرى او, نحوه كسب قدرت و سلب آن, نحوه توزيع قدرت و انتقال آن و ... پرداخته شود اما چون خوف اطاله مقال مى رود مشتاقان نظرات سياسى معلم ثانى را به تفصيل اين مباحث كه توسط نگارنده به زودى منتشر خواهد شد, ارجاع مى دهيم .&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;نوع دوم رهبرى: رياست تابعه مماثل &lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;در زمان فقدان رئيس اول فارابى وارد اين مقوله مى شود كه تكليف شريعت و آيين او چه مى شود به نظر مى رسد در اينجا فارابى بيشتر از منظر كلام شيعى به تبيين رهبرى مماثل مى پردازد و با ويژگيهايى كه براى آن ارائه مى دهد فلسفه امامت را در تشيع به نمايش مى گذارد زيرا او معتقد است اين نوع رهبرى از شرط حكمت و اتصال به منبع فيض الهى برخوردار است و در تمام وظايف و اختيارات مانند رئيس اول عمل مى كند و متولى امور دين و شريعت است كه اگر نياز به وضع قانون و تكميل يا تغيير باشد, بر اساس مصلحت و مقتضيات زمان خويش اعمال مى نمايد فارابى مى گويد: ((تغيير شريعت نه به اين معناست كه رئيس اول اشتباه كرده است بلكه خود رئيس اول هم اگر در اين زمان مى بود همين تغييرات را اعمال مى كرد. بنابر اين رفتار سياسى در توالى رياست مماثل كه چون ملك واحد هستند بدين صورت است)).(26)&lt;BR&gt;در ((السياسه المدينه)) فارابى در تحليل رهبران مماثل مى گويد ((اين گونه از رهبران اگر در زمان واحدى در يكى از نظامهاى سياسى سه گانه (مدينه فاضله ـ امت فاضله ـ معموره فاضله) اجتماع نمايند همه آنها مثل يك پادشاه هستند ((تكون كملك واحد)) زيرا رفتار و كردار و اهداف و اراده آنها يكى است و چنانچه به صورت متوالى در زمانهاى مختلف هم باشند باز نفوس آنها ((كنفس واحده))(27)است و دومى بر اساس سيره اولى عمل مى كند همانطورى كه رئيس اول مى تواند شريعتى را كه خويش در يك زمانى بر اساس مصلحت آورده بود در صورت مصلحت مهمتر در زمان ديگر تغيير دهد جانشين او هم مى تواند شريعت او را با همين ملاك مصلحت تغيير دهد)).&lt;BR&gt;فاذا خلفه (الرئيس الاول) بعد وفاته من هو مثله فى جميع الاحوال كان الذى يخلفه هو الذى يقدر ما لم يقدره الاول))(28) از طرف ديگر جانشين مماثل مى تواند مواردى را كه رئيس اول ناقص گذاشته است تكميل و تقدير نمايد. بنابر اين جانشين مماثل در شرايط و اوصاف و وظايف و كارويژه ها و ((حاكميت)) و خاستگاه دينى و مشروعيت الهى مانند رئيس اول است معلم ثانى در تحصيل السعاده با اشاره به مقام ((امام)) مبانى فكرى خويش را كه بر اساس تفكر شيعى در ((رئيس مماثل)) متبلور شده به خوبى مطرح مى نمايد او مى نويسد ((معناى امام در لغت عرب به كسى اطلاق مى شود كه پذيرش همگانى داشته باشد و حكومتش بالفعل موجود باشد اما وى با همان مايه هاى تفكر شيعى ادامه مى دهد كه در اصطلاح سياسى امام مماثل با رئيس اول (نبى) است ((فالملك او الامام هو بماهيته و بصناعته ملك و امام سوإ وجد من يقبل منه او لم يجد, اطيع او لم يطع وجد قوما يعاونونه على غرضه او لم يجد .... و لايزيل امامه الامام ... الا تكون له آلات يستعملها فى افعاله و لا ناس يستخدمهم فى بلوغ غرضه))(29) يعنى امام به واسطه امامتش اصالت دارد خواه مقبول عامه باشد يانباشد مطاع باشد يا نباشد كسانى او را يارى كنند يا نكنند به واسطه عدم مقبوليت و اطاعت و ياور امامتش زايل نمى شود. دكتر جعفر آل ياسين در تعليقه خويش بر اين عبارت به مبانى فكرى شيعى فارابى اشاره مى كند كه در اعتقاد شيعه امام معصوم (ع) چه حكومت تشكيل بدهد و چه در خانه بنشيند چه مبسوط اليد باشد و يانباشد در هر صورت امام است و به روايت مشهورى كه از پيامبر اسلام صلوات الله عليه و آله استناد مى كند كه فرمود ((الحسن و الحسين امامان قاما او قعدا)) امام حسن و امام حسين عليهماالسلام امام هستند چه قيام نمايند و چه در خانه بنشيند.(30)&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;نوع سوم رهبرى: رياست سنت (ولايت فقيه) &lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;نظام سياسى مطلوب فارابى, در هنگامى است كه رهبرى جامعه در دست ((رئيس اول)) يا ((رئيس مماثل)) باشد و چون چنين انسانهايى به ندرت يافت مى شوند و جامعه از وجود آنها محروم است بنابر اين ضرورت ادامه حيات اجتماعى و حفظ آيين و شريعت رئيس اول اقتضا مى كند كه نظام سياسى بدون رهبرى رها نشود و از طرفى هر كسى هم نمى تواند اين مسووليت را به عهده بگيرد بلكه شرايط لازم را بايد دارا باشد ((رئيس المدينه الفاضله ليس يمكن ان يكون اى انسان اتفق))(31) بر اين اساس معلم ثانى با جامع نگرى و واقع بينى بر مبناى تفكر شيعى خود رئيس سنت را پيشنهاد مى كند و با شرايط و ويژگيهايى كه براى آن بيان مى كند اين نوع رهبرى همانا رياست و ولايت فقيه بعد از امامان شيعه (ع) مى باشد. پس به اختصار اين نوع رهبرى را چنين مى توان تعريف و تقرير نمود ((نوعى از رهبرى است كه در زمان فقدان رئيس اول رئيس مماثل با تدبير, رهبرى يكى از سه نظام سياسى ((مدينه)) يا ((امت)) و يا ((معموره ارض)) را به عهده مى گيرد و سيره و سنت و شريعت گذشته را تثبيت و تحكيم مى نمايد و بر اساس آن نيازهاى زمان خويش را استنباط و جامعه را به سوى سعادت هدايت و ارشاد مى كند))(32)&lt;BR&gt;معلم ثانى مى فرمايد ((چنانچه بعد از ائمه ابرار يعنى كسانى كه رهبران حقيقى هستند جانشين مماثلى نباشد همه سنتهاى رئيس اول بدون كم وكاست و تغييرى حفظ مى شود و در اختيار رهبرى غير مماثل گذاشته مى شود تا به آنها عمل كند و در امورى كه تكليف آن توسط رئيس اول مشخص نشده ولى به اصول مقدره رئيس اول مراجعه و از طريق آن احكام امور مستحدثه و غير مصرحه را استنباط مى كند در اين جاست كه ((رئيس سنت)) نياز به ((صناعت فقه)) پيدا مى كند و اين صناعت است كه انسان را قادر مى سازد تا به وسيله آن به استخراج و استنباط همه امور و احكام وضع نشده توسط واضع شريعت بپردازد و با توجه به اغراض او در ميان امتى كه شريعت براى آنها وضع شده است, همت گمارد و كسى كه متولى اين امر است ((فقيه)) مى باشد.(33)&lt;BR&gt;آنچه در اين جا لازم به ذكر است اختلافى است كه در آثار معلم ثانى در مورد ملك سنت وجود دارد و به تبع آن برخى از محققان نيز دچار تشويش شده اند و مع الاسف به دليل عدم توجه به منظومه فكرى كه در همه آثار او آمده, مرتكب خطا شده اند. در ((آرإ اهل المدينه الفاضله)) و ((السياسه المدينه)) چون رئيس اول اعم از رئيس مماثل فرض شده رئيس سنت در مرتبه دوم قرار گرفته است در ((فصول مدنى)) در مرتبه سوم و در ((المله)) هم در مرتبه سوم بعد از جانشين مماثل آمده است و ويژگيهايى هم كه براى رئيس سنت مطرح شده, در آثار مختلف, ظاهرا با هم تفاوتهايى دارند. كه بر اين اساس برخى از محققان مصداق ملك السنته را امامان شيعه دانسته اند و برخى آن را منكر شده اند. اما همانطورى كه گذشت به نظر نگارنده امام شيعه در چارچوب رئيس اول تحت عنوان رئيس مماثل صحيح است ولى با توجه به اختلافهايى كه در اين خصوص وجود دارد و منشإ آن تفاوتهايى است كه در خود آثار فارابى آمده, در جمع آرا و اقوال معلم ثانى به اختصار مى توان گفت كه ملك السنته اگر مماثل باشد مراد از آن ((امام)) است و اگر غير مماثل باشد مقصود از آن جانشين امام يعنى فقيه جامع الشرايط است .&lt;BR&gt;... ادامه دارد.&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;پي نوشت : &lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;1-به داورى, رضا, فارابى موسس فلسفه اسلامى و ((فارابى)) مراجعه شود.&lt;BR&gt;2-فارابى در اين خصوص كتاب ((الجمع بين رإى الحكيمين)) را نگاشته است .&lt;BR&gt;3-از آثار مختلف فارابى حدود پنجاه اثر در اختيار است و بيش از 250 اثر پيرامون وى شناسايى و ملاحظه شده است.&lt;BR&gt;4- تفصيل ((فلسفه سياسى فارابى)) بزودى منتشر خواهد شد و موضوع ((انديشه سياسى فارابى)) عنوان پايان نامه كارشناسى ارشد نگارنده است.&lt;BR&gt;5- آرإ اهل المدينه الفاضله, ص 117 و تحصيل السعاده, ص 62 ـ 61 و السياسه المدينه, ص 69 .&lt;BR&gt;6- القياس الصغير على طريقه المتكلمين, ص 70 ـ 68 .&lt;BR&gt;7- سطوح سه گانه نظام سياسى فارابى به ترتيب عبارتند از ((مدينه فاضله)), ((امت فاضله)) و ((معموره فاضله)) .&lt;BR&gt;8- تحصيل السعاده, ص 94 ـ 92 .&lt;BR&gt;9- الحروف, 134 .&lt;BR&gt;1- 0همان , 133 .&lt;BR&gt;1- 1المله, ص 48 ـ 46 .&lt;BR&gt;1- 2همان, ص 47 .&lt;BR&gt;1- 3الحروف, ص 132 ـ 130 .&lt;BR&gt;1- 4الصفدى, الوافى بالوفيات, ج 1, ص 113 ـ 106 به نقل از الفارابى اثر دكتر حسين على محفوظ, ص 139 .&lt;BR&gt;15 -مراجعه شود به كتاب ((القياس الصغير على طريقه المتكلمين)) مبحث المقائيس الفقهيه)), ص 68 و كتاب ((القياس)), ص 64 ـ54 .&lt;BR&gt;16 - تحصيل السعاده, ص 93 ـ 92 .&lt;BR&gt;17 - همان, ص 93 .&lt;BR&gt;18 - آرإ اهل المدينه الفاضله, ص 125 .&lt;BR&gt;19 - فصول منتزعه ص 66, در السياسه المدينه ص 79 با تغييراتى در عبارت و حذف دو شرايط اخير شرايط را چنين بيان مى كند 1 ـ جودت ادراك اشيإ(تعقل), 2 ـ جودت ارشاد (اقناع), 3 ـ قدرت به كارگيرى هر كس در جايگاه خود بر حسب اهليت و استعداد, 4 ـ قدرت بر تقدير و تحديد و تسديد اعمال در مسير سعادت .&lt;BR&gt;20- دوازده شرط اول در آرإ اهل المدينه الفاضله ص 8 ـ 127 و چهار شرط اخير در تحصيل السعاده ص 95 آمده است.&lt;BR&gt;21-آرإ, 127 .&lt;BR&gt;22-تحصيل السعاده, ص 97 .&lt;BR&gt;23-فارابى, ابونصر, انديشه هاى اهل مدينه فاضله, ترجمه سيد جعفر سجادى, ص 274 . 24-داورى, رضا, فارابى, ص 178 .&lt;BR&gt;25-ناظرزاده كرمانى, فرناز, فلسفه سياسى فارابى, ص 256 ـ 234 .&lt;BR&gt;26-المله, ص 49 .&lt;BR&gt;27-&lt;BR&gt;28-المله, ص 49 .&lt;BR&gt;29-تحصيل السعاده, ص 97 و فصول منتزعه, ص 49 .&lt;BR&gt;30-آل ياسين, جعفر, تحصيل السعاده, ص 115 .&lt;BR&gt;31-آرإ اهل المدينه الفاضله, ص 122 .&lt;BR&gt;32-السياسه المدينه, ص 81 و المله, ص 50 .&lt;BR&gt;33-المله, ص 50 .&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;منبع:فصلنامه علوم سیاسی /س &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;مقالات مرتبط &lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;A title=&quot;فقه و رهبرى در انديشه سياسى فارابى (2)&quot; href=&quot;http://www.rasekhoon.net/Article/Show-36785.aspx&quot;&gt;&lt;B&gt;• فقه و رهبرى در انديشه سياسى فارابى (2) &lt;/B&gt;&lt;/A&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt; &lt;/P&gt;</description>
<pubDate>Sun, 11 Oct 2009 02:21:12 GMT</pubDate>
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<title>دفاع مقدس در مصاحبه با فارس </title>
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<description>&lt;DIV class=nwstxtlinkicons&gt; &lt;/DIV&gt;
&lt;DIV class=nwstxttoppane&gt;
&lt;DIV class=nwstxtnewsinfo&gt;
&lt;DIV class=nwstxtrotitr&gt;رئيس انجمن مطالعات سياسي حوزه علميه قم:&lt;/DIV&gt;
&lt;DIV class=nwstxtinfotitle&gt;ارزش‌هاي دفاع مقدس نبايد زيرپا گذاشته شود&lt;/DIV&gt;
&lt;P class=nwstxtlead style=&quot;LINE-HEIGHT: 160%&quot;&gt;خبرگزاري فارس: رئيس انجمن مطالعات سياسي حوزه علميه قم گفت:‌ نبايد به دليل برخي از اختلافات جزئي ارزش‌هاي دفاع مقدس زيرپا گذاشته شود.&lt;/P&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;DIV class=nwstxtpic&gt;&lt;IMG class=nwstxttoppic src=&quot;http://media.farsnews.com/Media/8807/Images/jpg/A0744/A0744440.jpg&quot;&gt;&lt;BR&gt;&lt;/DIV&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;P class=nwstxttext style=&quot;LINE-HEIGHT: 180%&quot;&gt;حجت‌الاسلام محسن مهاجرنيا امروز در گفتگو با خبرنگار فارس در قم با اشاره به آغاز هفته دفاع مقدس، در مورد نقش و تأثير هشت سال جنگ تحميلي در تثبيت و ادامه راه انقلاب اسلامي در سخناني اظهار داشت: جنگ و جهاد ادامه راه سياست و عصاره همه ارزش‌هاي انساني و اسلامي است. &lt;BR&gt;وي افزود: ملت‌هايي كه تجربه جهاد در برابر دشمنان نداشته‌اند، بي‌شك از تجربه سياسي موفقي نيز برخوردار نيستند و انقلاب اسلامي با عمر كوتاه 30 ساله خود، توانسته است تجربه گران‌سنگي در اين عرصه به دست بياورد. &lt;BR&gt;اين پژوهشگر حوزوي خاطرنشان كرد: پس از پيروزي شكوهمند انقلاب اسلامي، دو بلوك شرق و غرب براي از ميان برداشتن حق و حقيقت در جهان، هشت سال جنگ فرسايشي را بر ملت بزرگ ايران تحميل كردند، اما ايران اسلامي توانست از اين امتحان الهي سربلند بيرون بيايد. &lt;BR&gt;حجت‌الاسلام و المسلمين مهاجرنيا با بيان اينكه در دوران دفاع مقدس بسياري از ارزش‌هاي‌ ايراني و اسلامي در جامعه احيا شد، تصريح كرد: نهادينه شدن فرهنگ خودباوري و استقامت در برابر زورگويان و مستبدان، توليد ادبيات غني جهادي و به دست آوردن روحيه خلاقيت، ابتكار و اتكا به نيروهاي بومي، از جمله بركات هشت سال جنگ تحميلي است. &lt;BR&gt;رئيس انجمن مطالعات سياسي حوزه علميه قم با اشاره به جايگاه و اهميت جهاد و شهادت در آموزه‌هاي ديني و نصوص اسلامي خاطرنشان كرد: شأن نزول بسياري از آيات قرآن كريم و بسياري از مفاهيم ارزشمند همچون تولي و تبري، امداد غيبي، معامله خداوند با رزمندگان و دستيابي به اوج عرفان و معنويت در جبهه‌هاي جنگ، تنها در فرهنگ جهاد و دفاع مقدس متجلي مي‌شود. &lt;BR&gt;وي در بخش ديگري از سخنان خود اظهار داشت: درك شرايط سخت دوران جنگ و احساس كمبودهاي بسيار، موجب جهش در پيشرفت و تعالي كشور شده است و امروز جهانيان به عزت و اقتدار جمهوري اسلامي ايران در عرصه‌هاي مختلف علمي، سياسي، اقتصادي و فرهنگي پي برده‌اند. &lt;BR&gt;حجت‌الاسلام والمسلمين مهاجرنيا با بيان اينكه خداوند متعال بر داشتن برتري نسبت به دشمنان و كفار تأكيد مي‌كند، اظهار داشت: جنگ تحميلي به ما آموخت كه تنها با ايستادگي در برابر دشمنان و تكيه بر نيروي بازوان خويش مي‌توانيم در برابر مستكبران جهان از حيثيت و شرف خود دفاع كنيم. &lt;BR&gt;اين پژوهشگر حوزوي، دفاع مقدس را سفره نعمت و بركت براي انقلاب اسلامي و مردم دانست و گفت: اگر جنگ نبود، امروز دشمنان ما را در چنگال زورگويي‌هاي خود فرو برده بودند و كشورمان به اين سطح از پيشرفت دست نيافته بود. &lt;BR&gt;وي در ادامه افزود: بركات انقلاب اسلامي و دفاع مقدس، به سختي و با خون هزاران شهيد و مجاهدت رزمندگان جان بر كف به دست آمده است و امروز حفظ و حراست از آن بسيار اهميت دارد. &lt;BR&gt;وي با بيان اينكه امروز نبايد به دليل اختلافات جزيي، تمام اين ارزش‌ها و تلاش‌هاي بي‌شائبه را زير پا بگذاريم، اذعان داشت: دفاع مقدس و جنگ تحميلي بايد در جامعه و در ميان نسل جوان فرهنگ‌سازي شود و ايثار و از خودگذشتگي مجاهدان راه حق براي آيندگان بازسازي شود. &lt;BR&gt;رئيس انجمن مطالعات سياسي حوزه علميه قم در پايان بر نقش مهم و تأثيرگذار نخبگان، انديشمندان، صاحب‌نظران و اهالي قلم و هنر در نهادينه كردن فرهنگ جهادي دفاع مقدس تأكيد كرد. &lt;BR&gt;انتهاي پيام/ط20&lt;/P&gt;</description>
<pubDate>Wed, 23 Sep 2009 11:42:26 GMT</pubDate>
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<title>روز قدس - در مصاحبه با خبرگزاری فارس </title>
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<description>&lt;P dir=rtl&gt;                                                                         88/06/25 - 12:08شماره:880625044&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;روز قدس آزادي فريادهاي در گلو خفته مستضعفان ـ 28&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;مهاجرنيا: راهپيمايي روز قدس جاي زد و بند‌هاي سياسي نيست &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;خبرگزاري فارس: رئيس انجمن مطالعات سياسي حوزه علميه قم گفت: هيچ كس نبايد راهپيمايي روز قدس را وجه‌المصالحه و محل زد و بندهاي سياسي قرار دهد.&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;حجت‌الاسلام دکتر محسن مهاجرنيا امروز در گفتگو با خبرنگار فارس در قم با اشاره به فرا رسيدن روز جهاني قدس در سخناني اظهار داشت: روز قدس، روز مبارزه و مواجهه جهان اسلام با استكبار جهاني است و براي همه مسلمانان به عنوان يك نماد ارزشمند و اعتقادي پذيرفته شده است. &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;وي با بيان اينكه روز قدس يك روز معمول سياسي نيست و جنبه‌هاي فرهنگي و اجتماعي بسياري براي جهان اسلام به همراه دارد، خاطر‌نشان كرد: بزرگداشت روز جهاني قدس و حضور در راهپيمايي‌هاي عظيم مردمي در سراسر جهان، در واقع ايستادگي در برابر همه زورگويي‌ها و قلدرمآبي‌هاي مستكبران و صهيونيسم جهاني است. &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;اين استاد حوزه و دانشگاه ضمن تأكيد بر شناخت هر چه بيشتر ابعاد روز قدس در ميان اقشار مختلف مردم تصريح كرد: امام راحل (ره) با تعابير مختلفي بر حضور پرشور و آگاهانه مردم در راهپيمايي روز قدس تأكيد داشتند تا غده سرطاني كه مستكبران در قلب جهان اسلام كاشته‌اند از ميان برود. &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;رئيس انجمن مطالعات سياسي حوزه علميه قم با اشاره به زمزمه‌هايي مبني بر ايجاد تفرقه و اظهارنظرهاي جناحي در راهپيمايي روز قدس خاطرنشان كرد: همه جهانيان و رسانه‌هاي بيگانه به اين راهپيمايي پرشور چشم دوخته‌اند و هيچ‌كس نبايد اين روز عظيم را وجه‌المصالحه و محل زد و بندهاي سياسي قرار دهد. &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;وي همچنين روز قدس را نماد وحدت بخش ملت ايران و يادگار ارزشمند امام خميني (ره) دانست و گفت: نبايد روح مبارزه و ظلم‌ستيزي انقلاب اسلامي با اظهار نظرهاي بي‌جا مخدوش شود و همه جناح‌هاي سياسي و وفادار به انقلاب بايد پاسدار اين ميراث ارزشمند باشند. &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;حجت‌الاسلام دکتر مهاجرنيا در ادامه افزود: &lt;FONT color=#0033ff&gt;روز قدس، شب قدر انقلاب اسلامي است&lt;/FONT&gt; و همه بايد با شعارهاي وحدت‌آفرين و استكبارستيز، دسيسه‌هاي شوم دشمنان را خنثي سازند. &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;وي اظهار داشت: امروز همه مردم آگاه و هوشيار ايران اسلامي بايد حضور پرشور و با‌خروش‌تري نسبت به گذشته در صحنه‌هاي حساس انقلاب اسلامي داشته باشند تا هجمه گسترده تبليغات دشمنان به ويژه پس از انتخابات رياست جمهوري از ميان برود. &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;رئيس انجمن مطالعات سياسي حوزه علميه قم در پايان تصريح كرد: سردمداران كشورهاي غربي و حاميان صهيونيسم جهاني بايد بدانند كه اگر اختلافي نيز در خانواده بزرگ نظام اسلامي رخ داده باشد، اما همه ملت و مسئولان بر روي منافع ملي و جهان اسلام متحد و هم‌پيمان خواهند بود. &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;انتهاي پيام/ط20. &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt; &lt;/P&gt;</description>
<pubDate>Thu, 17 Sep 2009 12:27:18 GMT</pubDate>
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<title>اصول و چارچوب‌هاي مردم‌سالاري‌ ديني  قسمت 2 مصاحبه با تهران امروز</title>
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<description>&lt;P dir=rtl&gt;بازخواني انديشه سياسي امام‌خميني(ره) در گفت‌و‌گوروزنامه تهران امروز با دكتر محسن ‌مهاجرنيا - قسمت دوم &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT style=&quot;BACKGROUND-COLOR: #ffff00&quot;&gt;اصول و چارچوب‌هاي مردم‌سالاري‌ ديني &lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;قسمت اول گفت‌وگوي ما با دكتر مهاجرنيا درخصوص انديشه سياسي امام خميني(ره) در شماره ديروز به چاپ رسيد. در آنجا دكتر مهاجرنيا عنوان كرد كه ضرورت حكومت به عنوان يك گزاره عقلي، يكي از اصول ثابت تفكر سياسي حضرت امام(ره) است. &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;از ديگر اصول ثابت اين تفكر همچنين مي‌توان به تكليف محوري، عدالت‌محوري، فضيلت محوري، مردم سالاري ديني و انتخاب مردمي و نيز استكبار و استبداد ستيزي اشاره كرد. تفكر سياسي امام(ره) همچنين در برابر دو جريان انحرافي تحجر و سكولاريسم قرار گرفته و در چارچوب نوانديشي ديني تحليل مي‌شود. &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt; حسين جعفري &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;تهران امروز &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;با توجه به اهميت برجسته جايگاه ولايت‌فقيه در‌انديشه سياسي حضرت امام(ره)، نسبت‌انديشه‌هاي مقام معظم رهبري را با‌انديشه‌هاي حضرت امام(ره)و مفاهيم برجسته و کليدي‌انديشه ايشان را توضيح دهيد. &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;مي‌توانيم بگوييم که يکي از برجسته‌ترين شاگردان تفکر و‌انديشه سياسي حضرت امام(ره)، مقام معظم رهبري است و اصولا هم در حوزه تفکر و هم در حوزه عمل امام(ره)، مقام معظم رهبري به عنوان سکاندار جمهوري اسلامي ايران ادامه آن اتفاق بزرگي است که به نام انقلاب اسلامي رخ داد. بنابراين‌انديشه مقام معظم رهبري کاملا در ادامه‌انديشه سياسي امام(ره) مطرح مي‌شود، يعني‌انديشه ايشان هم نقش احيايي و هم نقش تکميلي نسبت به‌انديشه امام(ره) دارد. &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;در مورد ولايت‌فقيه مي‌توان دوره‌هاي تاريخي مختلف را در نظر گرفت. همان‌طور که پيش‌تر گفته شد ولايت‌فقيه در مرحله اول صرفا نيابت امام زمان(عج) بود ولي در مرحله دوم حاشيه‌نشيني سلاطين عادل مطرح شد، دوره مشروطه به نوعي طرح پيشگامي ولايت‌فقيه در اداره امور بود و مرحله چهارم ولايت‌فقيه طرح جمهوري اسلامي از سوي امام(ره) بود. &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;جمهوري اسلامي پديده بسيار جدي و جديدي‌ است و بنابراين اين نظام براي متحجران به هيچ عنوان قابل فهم نيست که مباحث جديدي چون جمهوري، &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;مردم سالاري، انتخاب و راي مردم در کنار آموزه‌هاي ديني قرار داده و گفته شود که راي مرد در مقام اثبات دين تأثيرگذار است. اين بحث اکنون هم پس از گذشت 30 سال از استقرار جمهوري اسلامي همچنان يکي از مباحث جدي جامعه است. &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;متاسفانه در همين ايام انتخابات هم يکي از دعواهايي که مطرح شد، نزاع بر سر رابطه مشروعيت و مقبوليت بود و هنوز هم به نوعي لاينحل مانده و با اينکه مقام معظم رهبري خيلي جدي هم درباره اين نزاع توضيح دادند ولي هنوز هم ديده مي‌شود که برخي ميان مقبوليت و مشروعيت فرق قائلند و معتقدند که راي مردم اصلا فاقد تاثير است و فقط آموزه‌ها و گزاره‌هاي ديني مهم است و مردم در اداره امور و تصميم‌گيري‌ها کاره‌اي نبوده و تنها به عنوان سياهي لشکر هستند. در حالي که حضرت امام(ره) اين مباحث را به گونه‌اي تلفيق کردند که نه دين بازيچه تفسيرها و قرائت‌هاي زمانه شود و نه اينکه به اراده و عقلانيت مردم خدشه‌اي وارد شود. از نظر امام(ره)، اين مردم مسلمان هستند که حکومت ديني را قوام مي‌دهند. از منظر امام(ره)، دين در مقام ثبوت است اما مردم دين را در مقام اثبات محقق مي‌کنند. بنابراين اگر مردم نباشند وضعيتي ثبوتي محقق نمي‌شود. مثلا از نظر امام(ره) علي(ع) در مقام ثبوت قطعا ولايت داشت اما تا زماني که مردم به ميدان نيامدند و آن را در مقام اثبات و تحقق خارجي حاکم نکردند امام علي(ع) 25 سال در گوشه خانه‌‌شان نشستند اما وقتي که اين حضور و تاييد مردم به ميدان مي‌آيد و در کنار آموزه‌هاي ديني قرار مي‌گيرد، مشروعيت ديني حاصل مي‌شود. بنابراين مقبوليت هم در درون همين مشروعيت است و اين دو موضع قابل تفکيک و جداشدن نيستند. حضرت امام(ره) اين پارادوکس مطروحه توسط متحجران را اين‌گونه حل کردند. &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;در ادامه تفکر جمهوري اسلامي‌انديشه امام راحل، مقام معظم رهبري مردم سالاري ديني را مطرح کردند. &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;مردم سالاري ديني همان شکل متکامل ولايت‌فقيه است. به اين‌ترتيب مي‌توان گفت که پنجمين مرحله ولايت‌فقيه را مقام معظم رهبري مطرح کرده‌اند. از نگاه ايشان، مردم سالاري ديني نوعي حکومت است که کاملا از دين گرفته شده است. در زمان حيات امام(ره)، بحث نسبت مردم سالاري و دين به صورت جدي مطرح نشده بود اما براي بسياري محل تامل بود اما بعد از رحلت اين مباحث به‌طور جدي‌تري طرح شد که چگونه بين مردم سالاري به مفهوم دموکراسي و دين پيوند مي‌توان قائل شد در حالي که در طول تاريخ، همواره بزرگان علمي و فکري ما مخالف دموکراسي بود‌ه‌اند. فارابي به‌عنوان موسس فلسفه سياسي اسلام رسما مي‌گفت دموکراسي بدترين نوع حکومت است. ابن‌سينا نيز معتقد بود که مدينه آزادي بدترين شکل حکومت است. خواجه نصيرالدين طوسي و ملاصدرا نيز همين ديدگاه را درخصوص دموکراسي داشتند. البته رگه‌هاي اين تفکر در يونان باستان بود که فيلسوفان مهمي چون افلاطون و ارسطو دموکراسي را بسيار بد مي‌ديدند. بنابراين متفکران ديني و فکري ما در طول تاريخ بر اين اعتقاد بودند که فهم آموزه‌هاي ديني نيازمند نخبگان و دانشمندان است و نبايد اختيار امور عامه را به دست عوام‌الناس سپرد. مبناي دموکراسي بر مساوات و برابري است و هر کسي مي‌تواند حاکم شود در حالي که در تفکر ديني کسي مي‌تواند حاکم شود که قدرت هدايت داشته و شايسته باشد و فهم، عقل، اجتهاد، ابعاد شخصيتي و جامعيت او نسبت به ديگران برتري داشته باشد تا بتواند جامعه را هدايت کند. بنابراين متفکران ما اعتقاد به نوعي نخبه‌سالاري داشتند که يا در قالب ولايت‌فقيه مطرح مي‌شد يا فيلسوفان ما آن را در قالب فيلسوف شاهي مطرح مي‌کردند. &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;اما در دوره جديد به دليل اينکه شرايط زمانه حکومت دموکراسي را به نوعي توجيه کرده بود، حضرت امام(ره) اين سبک حکومت را پذيرفتند. در دوره جديد هم مقام معظم رهبري اين بحث را به شکلي تئوريزه طرح کردند که ما دموکراسي و مردم سالاري را از غرب نگرفته‌ايم و اين‌گونه نيست که مردم سالاري و دين دو مفهوم باشد که يک مفهوم آن از غرب و ديگري از متن دين باشد و سپس اين دو مفهوم با هم سنجاق شود. بعد بگوييم که يک نوع حکومت تلفيقي درست کرده‌ايم. ايشان فرمودند که &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;مردم سالاري و ديني هر دو از درون دين درآمدند. به اين‌ترتيب مردم سالاري ديني همان ولايتي است که ما در طول تاريخ تحت عنوان ولايت خدا، پيامبر و ائمه داشته‌ايم. بنابراين مردم سالاري ديني يعني اينکه در حقيقت ولايت يک شکل خاصي از حکومت ديني است و تعريف خاصي در دين دارد. ولايت يعني اينکه بين والي و مولي عليهم يک ارتباط وسيع و ناگسستني وجود داشته باشد. پس مردم سالاري ديني نوعي از حکومت است که بين رهبران آن با مردم هيچ فاصله‌اي وجود ندارد بلکه از درون خود مردم، حاکماني انتخاب مي‌شوند و مردم بر اساس شايستگي، صلاحيت و تکليف عده‌اي را انتخاب مي‌کنند. &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;ولايت چند سطح دارد؛ ولايت نبوي، ولايت علوي و ولايت ولوي که همان ولايت در حکومت ولايي ولايت‌فقيه است، يک حکومت مهدوي هم وجود داردکه آن هم يک نوع ولايت است. همه اينها به نوعي مردم سالاري ديني مي‌شود. از شاهکارهاي مقام معظم رهبري اين است که ايشان مردم سالاري را درون ديني کرده‌اند و آن را به ولايت تطبيق داده‌اند و فرمودند که حکومت امام(ره) علي هم مردم سالاري ديني بود. تاکنون کمتر کسي جرات مي‌کرد که پديده جديد مردم سالاري را به تاريخ اسلام 1400 سال پيش سرايت بدهد ولي مقام معظم رهبري اين بحث را مطرح کردند. &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;از نظر شما نظريه مردم سالاري ديني مورد نظر رهبر معظم انقلاب اسلامي داراي چه اصول اساسي است؟ &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;در تفکر ايشان مردم سالاري اصولي دارد که با آن اصول شناخته مي‌شود. به اجمال به آنها اشاره مي‌کنم؛ يکي از اصل‌هاي ثابت مردم سالاري ديني در واقع حاکميت الهي است که در نقطه مقابل دموکراسي غربي قرار مي‌گيرد زيرا دموکراسي در غرب قاعده پيشيني ندارد يعني اين‌گونه نيست که يکسري قواعد از قبل در جامعه وجود داشته باشد و ما با آن قواعد کار کنيم. بلکه دموکراسي غربي بر اساس «قرارداد اجتماعي» بنا شده است. افرادي چون جان لاک و توماس هابز در بحث قرارداد اجتماعي اين گونه مطرح کرده‌اند که هيچ بحث پيشيني وجود ندارد و هيچ موضوع قدسي در جامعه نيست و انسان‌ها اين گونه با هم قرارداد مي‌بندند که ملک مشاع را، حکومت را خودشان اداره کنند در حالي که در مردم سالاري ديني موردنظر مقام معظم رهبري، يک قاعده ديني از قبل ثابت و تعيين شده‌اي وجود دارد که حاکميت خدا نام دارد. بنابراين مردم سالاري ديني به دنبال استقرار حاکميت الهي است. &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;اصل ثابت ديگر در مردم سالاري ديني آرمان‌‌گرايي وتحقق آرمان‌هاست. در نظام مردم سالاري ديني ما به دنبال تشکيل يک حکومتي هستيم تا براساس آن، آرمان‌ها و اعتقاداتي که دنبال آن هستيم، محقق شود. &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;اصل ديگر را در مردم سالاري ديني مي‌توان تحت عنوان شايستگي طرح کرد. تفکر اسلامي و شيعي از ابتدا مبتني بر شايسته‌سالاري بوده و حکومت مطلوب، حکومت صالحان به حساب مي‌آمد. در‌انديشه ديني ما ولي فقيه فردي جامع‌الشرايط، اعلم، مدير و مدبر است بنابراين کسي که در راس نظام مردم سالاري ديني قرار مي‌گيرد جزو شايستگان امت است. اين اصل در مردم سالاري ديني تفاوت‌هاي اساسي با آن تفکر سکولاري دارد که از غرب گرفته شده است و مي‌گويد در جامعه همه برابر و مساوي‌اند و هيچ‌کس بر ديگري برتر نيست و اموري چون تقوا، فضيلت و عدالت هيچکدام موجب برتري نمي‌شود. تفکر مردم سالاري ديني به‌دنبال شايسته‌سالاري است يعني کساني که آشناي به دين و آموزه‌هاي ديني هستند و قدرت هدايت جامعه را دارند بايد رهبري را به دست بگيرند. &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;تکليف‌محوري يکي ديگر از اصول ثابت مردم سالاري ديني است. در نظام‌هاي غربي چيزي به اسم تکليف وجود ندارد و هر آنچه قانون گويد مبناي عمل است. در حالي که تمام ابعاد و ارکان مردم سالاري ديني براساس تکليف است. &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;ايمان ديني، عدالت و فضيلت هم از ديگر اصول ثابت &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;مردم سالاري ديني است. به تعبير قرآن همه انبيا آمده‌اند تا عدالت را برپا کنند؛ «ليقوم‌الناس‌بالقسط» (انبيا آمدند) تا مردم قيام به قسط کنند. در اين زمينه مقام معظم رهبري تعبير جالبي دارند. بر اين اساس انبيا نيامدند که خود عدالت و قسط را ايجاد کنند و بروند بلکه انبيا بينات، کتاب، ميزان و حديد آوردند يعني در واقع قدرت اقتدار ايجاد کردند تا مردم قيام به قسط کنند و خودشان حکومت را تشکيل داده و عدالت را ايجاد کنند. &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;قانونگرايي و انتخاب مردمي از اصول ديگر مردم سالاري ديني مورد نظر رهبري است. برخلاف بسياري که مي‌گويند مردم نقش سياهي ‌لشکر داشته و نقش آنها چندان مهم نيست، مقام معظم رهبري اعتقادشان بر اين است که امکان ندارد حکومت تشکيل شود و از مجراي انتخاب مردمي نباشد و نمي‌توان بر مردم سلطه پيدا کرد در حالي که مردم راضي نباشند. &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;در مجموع مي‌توان گفت که مردم سالاري ديني که مقام معظم رهبري مطرح کرده‌اند شکل علمي و کامل همان ولايت‌فقيه است، در يک مرحله متکامل است. همان‌طوري که ولايت‌فقيه امام(ره) شکل کامل شده ولايت‌فقيه دوره مشروطه مرحوم ناييني و شيخ فضل‌الله نوري و ديگران بود و ديدگاه آنها شکل متکامل ديدگاه محقق کرکي بود و نظر محقق کرکي شکل متکامل شيخ مفيد، سيدمرتضي و شيخ طوسي بود. &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;از اصطلاحاتي که در ساليان اخير طرح شده، اصطلاح اصولگرايي اصلاح‌طلبانه است. با توجه به بيانات مکرر مقام معظم رهبري در اين خصوص، جايگاه اين مفهوم در‌انديشه سياسي ايشان چيست؟ &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;فارغ از اصطلاحاتي که فعلا در جامعه تحت عنوان اصولگرايي و اصلاح‌طلبي مطرح است بايد بحث را طرح کرد چون بنده خيلي اعتقادي به اين خط‌کشي‌هاي موجود ندارم. اين مرزبندي‌ها با تعريفي که مقام معظم رهبري دارند، تطابقي ندارد. ممکن است که بعضي از شاخصه‌هاي اصولگرايي موردنظر رهبري در جرياني که به اسم اصولگرايي است يا بعضي از اين شاخصه‌ها در جريان ديگري که موسوم به اصلاح‌طلبي قابل شناسايي باشد. از طرفي هم اينکه گفته شود تفکر اسلامي و‌انديشه سياسي امام(ره) و رهبري تنها منطبق با يکي از اين‌ جريان‌هاست نيز کاملا نادرست است. مگر ممکن است که فردي اصلاح‌طلب باشد ولي پايبند به اصول نباشد. اين امر اصلا محال است و اسم آن اصلاح نيست بلکه مفهوم اين امر انقلاب مي‌شود. اصلاح‌طلبي به اين معناست که تفکري داراي کاستي‌ها، نواقص و ناکارآمدي‌هايي است که کارآمدسازي آن را اصلا‌ح‌طلبي مي‌گويند. از اين‌ طرف هم امکان ندارد فرد يا مجموعه‌اي اصولگرا باشد ولي دنبال اصلاح نباشد که اين به معني تحجر خواهد بود. به عبارت ديگر تحجر يعني فرد يا گروهي پايبند به يکسري اصول ثابت باشند و هرگز حاضر به انعطاف‌ و اصلاح نباشند يعني اگر دچار انحطاط و کج‌‌فهمي شدند اصلا حاضر به اصلاح نباشند بنابراين ممکن است از دل اصولگرايي تحجر بيرون بيايد و همچنين ممکن است از دل اصلاح‌طلبي، سکولاريسم به‌ وجود آيد. &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;آن چيزي که مقام معظم رهبري به درستي مطرح کردند، اين است که ما اصولگراي اصلا‌ح‌طلب يا اصلا‌ح‌طلب اصولگرا هستيم که بسيار مهم است. همان‌طور که پيش‌تر عرض کردم امام(ره) در واقع رويکردهاي تک‌بعدي را حذف کردند. به همين دليل امام(ره) يک عارف کامل، فقيه کامل، مجتهد جامع‌الشرايط، سياستمدار تمام عيار، متکلم بزرگ و يک استاد اخلاق بي‌نظير است. مجموع اين خصوصيات است که امام(ره) را شاخص کرده است. مقام معظم رهبري هم دقيقا در امتداد مکتب امام(ره)، وقتي بحث اصولگرايي و اصلاح‌طلبي مطرح شد، اعلام کردند که اين دو مفهوم با هم معنا پيدا مي‌کنند بنابراين با نگاه تک‌بعدي حتما جامعه دچار مشکل مي‌شود که مشکلاتش را امروز مي‌توان در جامعه مشاهده کرد. &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;متاسفانه افراط و تفريط‌ها، کج‌فهمي‌ها و بسياري از مشکلاتي که جامعه امروز ما با آن مواجه است، محصول همين تفکر است. بنابراين مي‌توان گفت که افراط و تفريط‌هاي امروز مانع و مشکل اساسي جامعه ماست و مشکل مردم سالاري ديني همين افراط‌ و تفريطي است که از دل دو جناح موجود برمي‌آيد. &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;با نگاهي به‌انديشه سياسي مقام معظم رهبري مي‌توان به صراحت گفت که ايشان، چه قبل از پيروزي انقلاب و چه بعد از آن، همواره يکي از پيشگامان اصلاح‌طلبي بوده‌اند و در بعضي از موارد به مراتب جلوتر از اصلا‌ح‌طلب‌ها بعضي از مسائل را مطرح ‌کرده‌اند. به عبارت ديگر چه اصلا‌حي بالاتر از طرح مباحثي مثل نهضت نرم‌افزاري، بحث توليد علم و برپايي کرسي‌هاي نقد و نظريه‌پردازي که ايشان عنوان كرده‌اند. آزادانديشي به اين معناست که مخالف‌ترين افراد دعوت شوند و به آنها اجازه و آزادي داده شود تا مطالب خود را در عرصه رسانه‌ها به‌ويژه رسانه ملي بيان کنند چرا که اسلام براي پاسخگويي چيزي کم ندارد. در نتيجه مي‌توان گفت بسياري از بحث‌هاي اصلاح‌طلبان را مقام معظم رهبري از پايگاه رهبريت و از پايگاه دين مطرح مي‌کنند بنابراين مي‌توانيم بگوييم که ايشان به نوعي سردسته اصلا‌ح‌طلب‌‌ها هستند. البته اگر اصلا‌ح‌طلبي واقعي را دنبال کنيم. &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;درخصوص اصولگرايي هم مي‌توان به‌طور خيلي جدي گفت که مقام معظم رهبري به نوعي رهبر اصو‌لگراها هستند. گاه اصولگراها در برخي از موارد پايبند صداقت، ارزش‌ها و آموزه‌هاي ديني نيستند در حالي که اصولگرايي يعني اينکه در همه حال و در همه شرايط از ارزش‌هاي ديني عدول نشود، ولو اينکه به نفع جناح رقيب تمام شود. اين امر در برخي از اصولگرايان ديده نمي‌شود. &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;مقام معظم رهبري به تمام معنا يک اصولگراي واقعي هستند و همواره بر مبناي ارزش‌ها و موازين ديني عمل مي‌كنند. بنابراين مي‌توان گفت که ايشان در هر دو حوزه اصلاح‌طلبي و اصولگرايي پيشتاز هستند ضمن اينکه خودشان هم تصديق کرده‌اند که اصو‌لگراي اصلا‌ح‌طلبي و اصلا‌ح‌طلب اصولگرا هستند. &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;خيلي متشکريم از جنابعالي که در اين گفت‌وگو شرکت کرديد. &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;پرونده انديشه سياسي امام(ره) &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;نگارش روزنامه تهران امروز  &lt;/P&gt;</description>
<pubDate>Tue, 15 Sep 2009 12:32:18 GMT</pubDate>
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<item>
<title>حكومت‌ كار‌آمد ‌در ‌انديشه ‌سياسي ‌امام خميني‌(ره) (قسمت1)</title>
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<description>&lt;P dir=rtl&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;در تاريخ ۸۸/۰۶/۲۲&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT style=&quot;BACKGROUND-COLOR: #ffff99&quot;&gt;بازخواني انديشه سياسي امام‌خميني(ره) در گفت‌و‌گو با دكتر‌مهاجرنيا -&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT style=&quot;BACKGROUND-COLOR: #ffff99&quot;&gt; قسمت اول  &lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT style=&quot;BACKGROUND-COLOR: #ffff99&quot;&gt;/انجام گفت‌وگو با حجت‌الاسلام دكتر مهاجرنيا هم سهل است و هم ممتنع. كافي است تا پرسشي درافتد و اين روحاني بشاش و خوش‌سخن عنان كلام را از دست شما بستاند و خود گفت‌وگو را اداره كند. آن وقت است كه به شيوه خاص خودش، مباحث مختلفي را پيش مي‌كشد و از دل هر مبحث راهي به مبحث ديگر باز مي‌كند. &lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;گويا او به پرسش‌هاي مقدري كه از دل صحبت‌هايش سر مي‌كشد، پيش از آنكه مصاحبه‌گر به آنها بپردازد، پاسخ مي‌گويد. به قول علما مهاجرنيا اهل دفع و دخل مقدر است. حاصل آنكه، گفت‌وگو‌يي به‌دست آورديم با پرسش‌هاي اندك و پاسخ‌ه&lt;/FONT&gt;&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;حسين جعفري&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;FONT style=&quot;BACKGROUND-COLOR: #ff0000&quot;&gt;به‌عنوان آغاز گفت‌وگو از جنابعالي مي‌خواهيم كلياتي درخصوص انديشه سياسي حضرت امام(ره) بفرماييد.&lt;/FONT&gt;&lt;BR&gt;انديشه سياسي امام(ره) در حقيقت يكي از حوزه‌‌هاي معرفتي است كه مي‌توان درباره آن در منظومه انديشه حضرت امام(ره) بحث كرد. قبل از اينكه وارد تعريف و چيستي انديشه سياسي شوم لازم است اين نكته را اشاره كنم كه زندگي و حيات سياسي انسان‌ها به‌طور طبيعي نياز به تبديل، مديريت، انديشه و فكر دارد.&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;BR&gt;به آن چيزي كه پيرامون زندگي سياسي شكل مي‌گيرد اصطلاحا انديشه سياسي گفته مي‌شود. در حوزه سياست اصطلاحاتي چون علم سياست، حوادث سياسي و تحليل سياسي وجود دارد و در كنار اين‌ واژه‌ها، انديشه سياسي قرار دارد.&lt;BR&gt;انديشه سياسي و مخصوصا انديشه سياسي اسلام داراي حوزه‌هاي گسترده‌ و متنوعي مانند فلسفه سياسي، فقه سياسي، كلام سياسي يا الهيات سياسي، اخلاق سياسي و عرفان سياسي، جامعه‌شناسي سياسي، مسائل و روابط بين‌الملل است.&lt;BR&gt;درخصوص انديشه سياسي حضرت امام(ره) بايد گفت كه يكي از ويژگي‌هاي برجسته انديشه امام(ره) اين است كه ايشان در حقيقت حوزه‌هاي مختلف تفكر اسلامي را در كنار هم مي‌ديدند. در حقيقت شاخصه و ويژگي امام(ره) اين است كه انديشه ايشان، داراي جامعيت است و برخلاف بسياري از متفكران به يك بعد خاصي محدود نمي‌شود. به‌عنوان نمونه، بعضي از متفكران مثل بوعلي‌سينا، فارابي، خواجه‌نصير و ملاصدرا فيلسوفند و فقط فلسفه سياسي دارند و ديگر وارد حوزه‌هاي ديگر نمي‌شوند.&lt;BR&gt;برخي مانند ابوعلي مسكويه‌ روي اخلاق سياسي كار كرده‌اند، بعضي از متفكران مانند شيخ اشراق به نوعي عرفان سياسي دارند اما ويژگي تفكر امام(ره) اين است كه ايشان همه حوزه‌ها را به هم ارتباط مي‌دهند و يك جامعيتي را از دل همه اينها در مي‌آورند. بنابراين انديشه سياسي امام(ره)، نوع تاملاتي است كه ايشان پيرامون زندگي سياسي دارند. در واقع امام(ره) با استنباط از دين، آموزه‌هاي ديني را در باب زندگي سياسي مطرح مي‌كند.&lt;BR&gt;اصول و ويژگي‌هاي كلي انديشه سياسي امام(ره) چيست؟&lt;BR&gt;امام(ره) يكسري ويژگي‌هاي شخصيتي دارند كه در انديشه سياسي‌اش آمده و يكسري ويژگي‌ها و اصول كلي در بحث انديشه ايشان است كه اجمالا به آن اشاره مي‌كنم. بايد توجه كرد كه ويژگي‌هاي شخصيتي امام(ره) باعث شده كه ما انديشه‌اش را بسيار اساسي مي‌دانيم، چيزهايي مثل بصيرت ديني از شاخصه‌هاي بسيار بارز در انديشه امام(ره) است. همچنين خصوصياتي مثل سعه‌صدر، استعداد، تعمق‌گرايي، وقار ديني، حافظه تاريخي و غيرت ديني از خصايص و ويژگي‌هاي اصلي امام(ره) است كه در انديشه ايشان هم خودش را نشان مي‌دهد.&lt;BR&gt;يكسري ويژگي‌ها در انديشه امام(ره) است كه تحت عنوان اصول ثابت مي‌توانيم از آنها نام ببريم: اول، حاكميت الهي و ضرورت حكومت: در انديشه امام(ره) اصل ضرورت حكومت به عنوان يك امر بديهي طرح شده است. در كتاب ولايت فقيه -كه محصول درس خارج ولايت‌فقيه امام(ره) در سال 1347 است- امام(ره) عنوان مي‌كند كه هر كسي مقررات اسلامي و قوانين ديني را تصور كند، في‌البداهه تصديق خواهد كرد كه حكومت ضروري است و ولايت فقيه ضرورت دارد.&lt;BR&gt;در حقيقت ضرورت حكومت يك گزاره عقلي و نه صرفا يك بحث فقهي است و اين از اصول ثابت تفكر امام(ره) است يعني شما هيچ‌گاه و در هيچ‌ مرحله‌اي انديشه امام(ره) را نمي‌توانيد تصور كنيد كه بدون حكومت باشد در حالي‌كه بعضي از فقها در عصر غيبت قائل به حكومت اسلامي، آن هم حكومت تمام‌عيار نيستند و در حد امور حسبه حكومت را قبول دارند.&lt;BR&gt;اصل ديگري كه در حقيقت در تفكر امام(ره) است اصل تكليف محوري است. امام(ره) اعتقادش بر اين است كه در حقيقت شكل‌گيري و انجام و اجراي تمام مسائل سياسي تكليف ماست يعني همه آن چيزهايي كه از دين ما مي‌فهميم تكليف است.&lt;BR&gt;تكليف محوري يك اصل ثابتي است كه هيچ‌وقت در انديشه امام(ره) تعطيل نمي‌شود و همه رفتار سياسي و سيره علمي و عملي امام(ره) را براساس تكليف آن مي‌توانيم تحليل بكنيم.&lt;BR&gt;يكي ديگر از ويژگي‌ها و اصول ثابت انديشه امام(ره) ايمان ديني در حوزه تفكر اسلامي است. در تمام مسائل حكومتي سياسي كه امام(ره) در دوره مبارزات و در دوره حكومت اسلامي تعقيب مي‌كند، ايمان در حقيقت اساس و زيرساخت فكري ايشان است كه بسيار هم اساسي است.&lt;BR&gt;عدالت‌محوري و فضيلت محوري هم از شاخصه‌هاي ديگر انديشه سياسي امام(ره) است. همچنين مردم‌سالاري ديني و انتخاب مردمي هم از اين اصول ثابت است. يك تفكر اين بود كه اصلا دموكراسي در اسلام قابل پياده شدن نيست، سكولارها مي‌گفتند دموكراسي محصول تفكر غربي است و جايي در دين ندارد. در مقابل متحجرين بر اين اعتقاد بودند كه دين را نبايد آلوده به دموكراسي كرد. اجماع‌نظر اين دو گروه اين بود كه دموكراسي ديني يا همان مردم‌سالاري ديني اصلا محال است در حالي‌كه امام(ره) آمد و جمهوري اسلامي را ايجاد كرد و جمهوريت را با اسلاميت تلفيق كرد و موفق هم شد كه اين الگو را در مقام عمل پياده بكند.&lt;BR&gt;اتكا بر جامعيت اسلام ديگر ويژگي كليدي در انديشه امام(ره) است. امام(ره) در تفسير سوره حمد كه در مدرسه فيضيه قم برگزار شد، اشاره كردند كه اسلام را نبايد تك‌بعدي نگاه كرد و آنجا اشاره دارند كه مفسران ما به يك راهي رفتند، عرفاي ما يك بخشي از اسلام را گرفتند و اصرار هم داشتند كه اين حرف ما درست است و حرف ديگران باطل. فقهاي ما يك بخشي از دين را گرفتند و همه مخالفان خودشان را تكذيب كردند، فيلسوف‌هاي ما يك بخشي از دين را گرفتند و بقيه‌اش را كنار گذاشتند. ايشان آمدند گفتند كه دراسلام هيچ‌كدام از اينها به تنهايي نيست و اسلام همه اينهاست و نگاه ديني از درون همه اين حوزه‌ها و رويكردها در مي‌آيد. بنابراين يكي از اصول ثابت و زيرساختي فكر امام(ره)، جامعيت انديشه ايشان است. بنابراين امام(ره) را نبايد تنها به‌عنوان يك فقيه و مرجع تقليد تصور كنيم.&lt;BR&gt;نفي سلطه بيگانه يا استكبار‌ستيزي و استبدادستيزي نيز از ويژگي‌ها و اصول ثابت انديشه امام(ره) است.&lt;BR&gt;امام(ره) يكسري قواعد هم دارند يعني امام(ره) ضمن اينكه به اصول ثابت فوق اعتقاد دارد، وقتي مي‌آيد در يك شرايط زماني قرار مي‌گيرد به سازوكارهاي متغيري هم قائل مي‌‌شود.&lt;BR&gt;ما يك چالشي داريم تحت عنوان چالش سنت و مدرنيته يا به تعبير عرب‌ها چالش قداست و اصالت، قديم و جديد، ثابت و متغير، اينها چالش‌هايي است كه ذيل اين عنوان به وجود مي‌آيد.&lt;BR&gt;آن چيزي كه در انديشه امام(ره) بسيار مهم است، توجه به اين است كه امام(ره) آن‌گونه نيست كه ركن و اصول ثابت و قواعد لايتغيري داشته باشند كه هميشه ثابت باشد؛ بلكه امام(ره) وقتي به مساله زمان مي‌رسند شرايط زماني و مكاني را هم در نظر مي‌گيرند. يعني اين‌گونه نيست كه ثابت بايستند و بگويند يك شكل خاص وجود دارد و اين قابل تغيير نيست. حكومت اسلامي ممكن است به تناسب مكان و زمان، شكل و ساختار متغيري را به خودش بگيرد.&lt;BR&gt;در زماني مثل حكومت پيامبر(ص)، حكومت فردي بود شرايط آن زمان و جامعه آنقدر گسترده نبود بنابراين رهبري پيامبر اقتضائشان اين بود كه به صورت فردي حكومت را اداره بكنند اما دوره امام علي(ع) تقريبا شرايط بسيار پيچيده مي‌شود، حوزه قلمرو حكومت اسلامي بسيار گسترده است، بنابراين حكومت تقريبا شبه فدرالي مي‌شود لذا اينجا مي‌بينيد كه امام علي(ع) تصميم مي‌گيرد كه مالك‌اشتر را به شاخ آفريقا بفرستند و اختيارات كامل و خودمختارانه‌اي به او بدهد.&lt;BR&gt;در دوره ما حكومت مردم‌سالارانه اقتضاي زمانه است يعني كارآمدترين حكومت‌ها مردم‌سالاري است بنابراين وقتي اين شكل از حكومت، حكومت كارآمد مي‌‌شود امام(ره) هم اين را مي‌پذيرند. ممكن است كه در آينده يك شكل ديگري پيش بيايد كه حالا يا تكميل اين باشد يا عدول از اين باشد به هر صورت&lt;BR&gt;اين‌گونه نيست كه ضروري باشد در انديشه امام(ره) ما حتما بگوييم كه شكل و ساختار ثابت است و هيچ عوض نمي‌شوند. اين امور جزو چيزهاي قابل تحول بوده و تابع مسائل جامعه است و سير تطور و تحول اينها هميشه در انديشه امام(ره) پذيرفته شده‌ است.&lt;BR&gt;نكته بعدي درخصوص ديدگاه‌هاي حضرت امام(ره) اينكه انديشه سياسي امام(ره)، ضمن اينكه مجموعه‌اي از حوزه‌هاي معرفتي است، اين بضاعت را دارد كه هر متفكري از زاويه‌اي ‌بتواند آن را تعقيب كند؛ يعني شما راحت مي‌توانيد فلسفه سياسي امام(ره) را ترسيم بكنيد يا در حوزه فقه سياسي راحت مي‌توانيد فقه سياسي امام(ره) را به عنوان يك حوزه معرفتي خاص تعقيب بكنيد يا عرفان سياسي امام(ره) كه در واقع شاخصه بسيار اساسي در تفكر سياسي امام(ره) است.&lt;BR&gt;همان‌طور كه مستحضر هستيد، يك دو قطبي در زمان حيات حضرت امام(ره) وجود داشت به نام دو قطبي سكولاريسم و تحجر. اين دو قطب متضاد به‌‌گونه‌اي مسائل سياسي را مطرح مي‌كنند كه گويا تنها شيوه تحليل مباحث از دهليز آنها ميسر است ولاغير. مي‌خواستيم بدانيم كه نسبت انديشه حضرت امام(ره) با اين دو نوع ديدگاه چيست و اين انديشه داراي چه وجوهي به نسبت آن دو ديدگاه است؟&lt;BR&gt;حدود 150 سال پيش كه تفكر ديني ما با تفكر غربي يا تفكر مدرن مواجه شد‌، دچار شوك شد و حتي شكاف‌هايي در درون اين تفكر پيدا شد. در دوره مشروطه شاهد طرح اين شكاف‌ها به صورت جدي است. در اين دوره از درون تفكر ديني دو نحله فكري بيرون آمد؛ يكي نحله‌اي بود كه وقتي كه دستاوردها و تفكر غربي را مي‌ديد، شديدا شيفته آن مي‌شد و گرايش به آن پيدا مي‌كرد.&lt;BR&gt;شما در صدر مشروطيت بعضي از عبارت‌ها را مي‌بينيد كه امروز هم تكرار مي‌شوند كه مثلا فلان شخصيت مي‌گفت كه «ما از فرق سر تا نوك انگشتان پا بايد غربي بشويم.» در مقابل اين تفكري كه شيفته غرب مي‌شود، ما تفكر ديگري هم داريم كه شديدا امنيتي برخورد مي‌كند يعني وقتي با ديواره مستحكم تفكر غربي رودررو مي‌شود، يك نوع بازگشت به عقب برايش به وجود مي‌آيد و احساس مي‌كند كه ما در اين چالش و مواجهه جديد نه‌تنها چيزي به دست نمي‌آوريم بلكه هويت خودمان را هم از دست مي‌دهيم.&lt;BR&gt;بنابراين يك نوع سلفي‌گري و بازگشت به عقب در تفكر ديني به وجود مي‌آيد، مي‌توان اسم آن را تحجر گذاشت، تحجر از ماده حجر است، تحجر يعني اينكه آدم مانند سنگ مي‌شود؛ يعني هيچ انعطافي ديگر نشان نمي‌دهد و سخت به يكسري اصول و اعتقادات پايبند مي‌شود و در هيچ حالتي كوتاه نمي‌‌آيد، اين نوع بازگشت به عقب در حقيقت به افراط و تفريط مي‌رسد و به اين رويكرد منجر مي‌شود كه ما اصلا نبايد به سمت غرب برويم، اصلا ما نبايد به سمت جلو حركت كنيم بلكه ما همين داده‌هاي خودمان و همين پيشينه سنتي فكري و ديني خودمان را بايد حفظ بكنيم. البته شايد بتوان گفت كه دغدغه اوليه آنها دغدغه مطلوبي بود اما اين احتياط كاري آنها به آنجا رسيد كه ديگر اصلا حركت به جلو را فراموش كردند.&lt;BR&gt;تفكر تحجري و تفكر سكولاريستي در اين 100 ساله اخير به صورت دو نحله موازي در حركت بوده‌اند، در كنار اين دو نحله افراطي، يك تفكر اعتدالي هم داشتيم كه مي‌توانيم اسم آن را «نوانديشي ديني» بگذاريم. اعتقاد نوانديشان ديني اين بود كه نه بايد از غرب هراس داشته باشيم و نه بايد برويم دودستي غرب را بچسبيم. به اعتقاد اين افراد ما مي‌توانيم بر مبناي رهاورد ديني و سنت اسلامي خودمان از تجربه بشري استفاده كنيم و از اين ديواره مستحكم غربي عبور بكنيم. به سخن ديگر ما هم مي‌توانيم يك بخشي از گذشته را احيا كنيم و هم از تجربه بشري استفاده كنيم بنابراين يك نوانديش ديني هم سنت ديني را با خودش حمل مي‌كند و هم اينكه از تجربه جديد بشري مي‌خواهد استفاده كند. نوانديشي ديني وارد يك فاز فكري‌ مي‌شود كه بسياري از مفاهيم آن نو هستند.&lt;BR&gt;در صدر مشروطه كه مفاهيم جديد مانند پارلمان، قانون، آزادي، دموكراسي و احزاب وارد ذهنيت ما مي‌شود مي‌بينيد كه بسياري از علما مبهوت شدند و مي‌گفتند قانون چي هست؟ ما قانون مي‌خواهيم چكار؟ مگر اسلام چيزي كم دارد كه شما مي‌خواهيد با قانون به آن وصله بزنيد؟ بنابراين شما مي‌بينيد بسياري از انقلابيون در مقابل بعضي از مفاهيم موضع مي‌گيرند يا در مقابل احزاب خيلي‌ها موضع گرفتند، ما حزب مي‌خواهيم براي چه؟ ما اصلا چيزي به اسم حزب نمي‌شناسيم.&lt;BR&gt;در مقابل اين تفكرات شما يك نوانديشي ديني به اسم امام(ره) داريد كه وقتي وارد مي‌شود، تلاش مي‌كند بسياري از رويكردها، ديدگاه‌ها و بينش موجود را اصلاح بكند. بنابراين در تفكر امام(ره) يك نوع اصلاح‌گرايي قابل مشاهده است.&lt;BR&gt;يكسري چيزها در سنت ديني ما از بين رفته و غبار گرفته كه اينها براي امروز بايد غبارروبي و احيا شوند و يكسري چيزها هست كه در شرايط موجود نياز به انقلاب دارند. بنابراين انديشه امام(ره) را هم مي‌توان گفت انقلابي است و هم اصلاحي و احياگرانه است.&lt;BR&gt;براساس اين ترسيمي كه عرض شد، انديشه سياسي امام(ره) دو رقيب جدي دارد و اگر ما بخواهيم گفتمان‌هايي ديگر را در كنار گفتمان حضرت امام(ره) مطرح كنيم با دو گفتمان يا در واقع خرده گفتمان مواجه مي‌شويم، يك گفتمان در واقع گفتمان سكولار است و ديگري هم گفتمان متحجر نام دارد. البته بعضي از متفكران جديد، گفتمان نوانديشي امام(ره) را «گفتمان مجدد» مي‌گويند و گفتمان سكولار را «گفتمان متجدد» مي‌نامند.&lt;BR&gt;وقتي انديشه امام(ره) در دوره مبارزات و بعد از پيروزي انقلاب اسلامي به صورت جدي مطرح مي‌شود شما كاملا مي‌بينيد كه در حقيقت بخشي از تعريف انديشه سياسي امام(ره) وابسته به نسبت آن با دو تفكر رقيب است و اين موضوع در همه حوزه‌ها خودش را نشان مي‌دهد. اين امر را مي‌توان در بحث ولايت فقيه كه مهم‌ترين شاهكار امام(ره) بود و در قانون اساسي جمهوري اسلامي مطرح شد، مشاهده كرد.&lt;BR&gt;تفكري در اوايل انقلاب در مقابل ولايت فقيه شديدا ‌ايستاد و مي‌گفت كه ولايت فقيه يك سنت قديمي است و يك بحث متناسب با امروز نيست بنابراين شديدا با آن مبارزه مي‌كرد. حتي بعضي از علما به امام(ره) نامه مي‌نوشتند كه ولايت فقيه را شما مطرح نكنيد، چون ولايت فقيه نمي‌تواند اداره يك حكومت را به اين گستردگي در دنياي مدرن با اين شرايط خاص برعهده بگيرد.&lt;BR&gt;از آن‌طرف هم عده‌اي مخالف ولايت فقيه بودند اما از ميان اينها امام(ره) ولايت فقيه را به عنوان يك حكومتي با اقتدار، آن هم در دوره قطب‌بندي جهان يعني قطب‌بندي شرق و غرب و از دل آب و آتش به وجود آوردند.&lt;BR&gt;البته ولايت فقيه چند مرحله تاريخي را طي كرده تا اينجا آمده است؛ تقريبا از قرن سوم يعني آغاز ولايت فقيه، تا قرن دهم آن چيزي كه ما در تفكر ديني داريم ولايت فقيه در حد نيابت امام(ره) عصر است. همه فقها اعتقادشان اين بود كه فقها نيابت دارند اما اينكه چگونه و در چه مواردي نيابت دارند و گستره، قلمرو، ساختار و شكل آن چگونه است اصلا مورد بحث واقع نمي‌شد.&lt;BR&gt;از جمله دلايل اينكه شرايط هم به آنهايي كه اعتقاد به نيابت خيلي جدي داشتند هم اجازه نمي‌داد به اين مبحث بپردازند. از قرن دهم يعني آغاز صفويه كه يك حكومت شيعي در ايران به وجود مي‌آيد و آنها خودشان از علمايي چون مجلسي و ميرداماد در تشكيل حكومت شيعي دعوت كردند اندك اندك علما در حاشيه سلاطين عادل مطرح مي‌شوند. بعد از دوره صفويه و در اواخر دوره قاجاري، يكدفعه علما به اين نتيجه رسيدند كه ولايت فقيه را به‌صورت مستقيم مطرح كنند بنابراين در دوره مشروطه علما خط مقدم مبارزه شدند و مشروطه را به پيروزي رساندند.&lt;BR&gt;پس از اين بود كه ولايت فقيه مستقيما مطرح مي‌شود. منتهي در ابتدا نقص‌ها و كاستي‌هايي در تفكر علما بود و آنها بسياري از ساختارها را نديده بودند و بسياري از پديده‌ها را ارزيابي نكرده بودند. بنابراين شما مي‌بينيد كه مشروطه با شكست مواجه مي‌شود.&lt;BR&gt;امام(ره) دقيقا ولايت فقيه را در ادامه مشروطه به‌گونه‌اي طرح كرد كه يك حكومت تمام‌عيار از دل آن در مي‌آيد، حكومتي كه در حد مرزي آن يك‌طرف سكولارها هستند، يك طرفش متحجران هستند و يك حكومت كاملا ديني و مقتدر اسلامي در مقابل اينها شكل مي‌گيرد. متاسفانه بعدها دو تفكر افراطي و تفريطي شديدا براي انقلاب مشكل درست كردند و بسياري از گرفتاري‌ها هم از همين دو نوع تفكر هست. يك تفكر مي‌خواهد همه چيز را به سمت غرب پيش ببرد و تفكري هم كه حالت تحجر و مقدس مابي دارد در اين سوي معركه مشكل‌ساز مي‌شود.&lt;BR&gt;به تعبير امام(ره)، ولايتي‌هاي بي‌ولايت و مقدس‌مابان بي‌تقدس اين‌گونه مي‌انديشند و در حقيقت آنها مي‌خواهند مايه‌هاي پويايي و كارآمدي تفكر امام(ره) را خدشه‌دار كنند.&lt;/P&gt;
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<pubDate>Sun, 13 Sep 2009 22:34:27 GMT</pubDate>
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<title>با خبرگزاری جمهوری اسلامی</title>
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&lt;DIV class=&quot;ffDefault fs14 clBlue bold soot&quot; style=&quot;CLEAR: both; LINE-HEIGHT: 150%&quot;&gt;مولف کتاب انديشه سياسي آيت الله خامنه اي در خصوص مديريت جريان‌هاي داخلي از سوي ايشان گفت: در زمان بيست سال رهبري مقام معظم رهبري، سه دولت با سه نوع خط مشي داشتيم، دولت سازندگي، دولت اصلاحات و دولت اصول‌گرا، اما مقام معظم رهبري به گونه‌‌اي مديريت مي‌کنند که افراط و تفريط‌ها آرام و هضم مي‌شود. &lt;/DIV&gt;&lt;/DIV&gt;&lt;/TD&gt;
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&lt;DIV class=&quot;ffTahoma fsSmal taR&quot; id=newsBodyDiv style=&quot;MARGIN: 2px 5px; LINE-HEIGHT: 200%; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;حجت‌الاسلام محسن‌مهاجر‌نيا مدير گروه سياسي پژوهشکده فرهنگ و انديشه اسلامي که در گفت‌وگو با خبرنگار سياسي ايرنا سخن مي گفت، در بررسي ابعاد رهبري مقام معظم رهبري از بعد جامعه‌شناختي اظهار داشت: مقام معظم رهبري در مسائل جامعه‌شناختي نقش يک طبيب را دارد و معظم‌له استناد مي‌کنند به حديثي از حضرت علي(ع) که فرمودند، «طبيب دوار بطبه». &lt;BR&gt;مهاجرنيا در اين خصوص گفت: طبيب کسي نيست که منتظر بيمار بنشيند بلکه خودش به دنبال مريض براي درمان کردن مي‌گردد و مقام معظم رهبري در خصوص مسائل اجتماعي و مشکلات هم‌چون يک طبيب متخصص با پشتوانه تخصص و تجربه مشکلات را شناسايي و ريشه‌يابي مي‌کنند. &lt;BR&gt;وي با اشاره به اينکه آيت الله خامنه اي پس از ريشه‌يابي معضلات، سراغ بازسازي نظام مطلوب مي‌روند، گفت: بساري از جامعه‌شناسان ابتدا تجويز مي‌کنند و بعد به سراغ جامعه مي‌روند اما مقام معظم رهبري ابتدا مشکل را مي‌بينند، بعد ريشه‌يابي مي‌کنند و سپس نظام مطلوب را بازسازي مي‌کنند و نهايتا تجويز مي‌کنند. به اين جهت است که من مي‌گويم در مورد ايشان ، انديشه بر عمل حاکميت دارد. &lt;BR&gt;مهاجرنيا به موضوع تهاجم فرهنگي اشاره کرد و گفت: تهاجم فرهنگي سال‌ها دغدغه همه بود و همه آن را مي‌ديدند اما مقام معظم رهبري ديدند تهاجم فرهنگي از حالت طبيعي خارج شده و از تبعات جهاني شدن نيست بلکه يک توطئه پشت آن است، ايشان بلافاصله نظام مطلوب را بازسازي کردند و راه برون‌رفت را براي نظام ترسيم کردند. &lt;BR&gt;وي در ادامه به بررسي مسائل بين‌المللي پرداخت و گفت: در اين مسائل هم مشي مقام معظم رهبري حاکميت انديشه بر عمل است و در مسائل بين‌المللي انديشه امام به مقام معظم رهبري انتقال يافته است، معظم‌له نه نگاه احساسي به مسائل خارجي دارند و نه آنقدر آن را بزرگ فرض مي‌کنند که بخواهند عقب‌نشيني کنند. &lt;BR&gt;مولف کتاب انديشه سياسي آيت الله خامنه اي در خصوص مديريت جريان‌هاي داخلي از سوي ايشان گفت: در زمان بيست سال رهبري مقام معظم رهبري، سه دولت با سه نوع خط مشي داشتيم، دولت سازندگي، دولت اصلاحات و دولت اصول‌گرا، اما مقام معظم رهبري به گونه‌‌اي مديريت مي‌کنند که افراط و تفريط‌ها آرام و هضم مي‌شود. &lt;BR&gt;مهاجرنيا تاکيد کرد: برخي از اين افراطي‌گري‌ها به حدي بود که عده‌اي در دوران اصلاحات بيم اتفاقات خطرناکي را براي نظام داشتند اما درايت مقام معظم رهبري اين جريانات را تبديل به سوپاپ اطمينان کرد و امروز همان کساني که نگران بودند مي‌گويند اگر اين تغييرات از سوي دولت‌ها انجام نمي‌شد امروز انقلاب دچار بحران مي‌شد. &lt;BR&gt;وي در پايان خاطرنشان کرد: تدبير مقام معظم رهبري عقده‌هاي متراکم را تعديل کرد و در جايي هم بسياري از رفتارهاي عجولانه دولت‌ها را متعادل کردند که در نهايت آينده انقلاب تضمين شد. &lt;/DIV&gt;&lt;BR&gt;
&lt;DIV class=&quot;ffDefault fsSmal soot&quot; style=&quot;MARGIN-BOTTOM: 20px&quot;&gt;&lt;SPAN class=title id=FullStory_rptViewNews_ctl00_lblEndNews&gt;انتهای خبر / خبرگزاری جمهوری اسلامی (ايرنا) / کد خبر&lt;/SPAN&gt; 602246 &lt;/DIV&gt;</description>
<pubDate>Mon, 27 Jul 2009 06:59:52 GMT</pubDate>
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